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वैदिक अमिताचार्य का जन्म राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर जिले के चौमूं नगर में 15 अक्टूबर 1996 को भारद्वाज गोत्रीय गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ।8 वर्ष की अवस्था में उपनयन संस्कार से उपनीत होकर यजुर्वेदीय वैदिक शिक्षा का अध्ययन कर सन 2012 में स्वर्णपदक से सम्मानित हुए। आपने जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री, शिक्षाशास्त्री, वेदाचार्य आदि विविध उपाधियां प्राप्त की एवं 16 वर्ष की अवस्था में आपने पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर श्रीमज्जगद्गुरु अग्रपीठाधीश्वर डॉ राघवाचार्य जी महाराज रैवासा धाम से भागवतीय दीक्षा ग्रहण कर उन्हीं के सान्निध्य में प्रथम श्रीमद्भागवत कथा प्रवचन किया उसके उपरांत भारत के विविध नगरों में भागवत कथा, रामकथा, भक्तमाल कथा और भी अन्यान्य पुराणों की कथा आपके श्रीमुख से निःसृत हुई कथा यात्रा की इस परम् पावन श्रृंखला में अब तक आपके द्वारा सनातन धर्म संरक्षण हेतु वैदिक धर्म संस्थापनार्थ शताधिक कथाएँ सम्पन्न हो चुकी हैं। आपने वेद के साथ साथ वेदाङ्ग ज्योतिष का भी अध्ययन किया हैं जिससे आप ज्योतिषीय समाधान के द्वारा भी लोकहितार्थ कार्य कर रहे हैं।
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रुद्राष्टाध्यायी
ukl yajurved sanhita adhyay 3 शुक्ल यजुर्वेद संहिता तृतीय अध्याय का सम्पूर्ण पाठ (अध्याय - 3)
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श्रीमद्भागवतायनम् - वैदिक अमिताचार्य जी
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Shri Bhagwat Kathagyan Yagya 2021 By Vaidik Aacharya Amit Shastri Day-4 Part-2
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*!! कार्तिक स्नान का विधान!!*
*!! कार्तिक स्नान का विधान!!* कार्तिक स्नान आश्विन माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अगले माह कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस पवित्र स्नान को आरंभ करने से पहले आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी आने पर भगवान विष्णु को प्रणाम कर कार्तिक व्रत करने की आज्ञा लेनी चाहिए। इस तरह से आज्ञा लेने से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने भक्त पर कृपा कर उसे आत्मिक बल तथा मनोबल प्रदान करते हैं। साथ ही ईश्वर अपने भक्त को विधिपूर्वक कार्तिक व्रत करने की सद्बुद्धि देते हैं। सभी बारह मासों में मार्गशीर्ष मास को अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है, उससे भी अधिक पुण्य देने वाला वैशाख मास कहा गया है। प्रयाग में माघ मास का अधिक महत्व है तथा इससे भी महान तथा अधिक फलदायी कार्तिक मास को कहा गया है। जब ब्रह्मा जी ने एक तरफ सभी प्रकार के दान, व्रत तथा नियम रखे और दूसरी ओर कार्तिक का स्नान रखकर तौला तो कार्तिक स्नान का पलड़ा ही भारी पाया। भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए आश्विन की पूर्णिमा से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तक प्रतिदिन गंगा जी में स्नान करना चाहिए। यदि गंगा जी नहीं है तब किसी भी नदी, तालाब अथवा पोखर आदि में कार्तिक स्नान करना चाहिए। यदि कुछ भी नहीं है तब नियमित रुप से घर पर ही स्नान करना चाहिए। देवी पक्ष अर्थात भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्रि आने तक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के लिए आश्विन कृष्ण चतुर्थी से लेकर कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक नियमपूर्वक स्नान करना चाहिए। भगवान जनार्दन को प्रसन्न करने के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। जो मनुष्य जाने-अनजाने कार्तिक मास में नियम से स्नान करते हैं, उन्हें कभी यम-यातना को नहीं देखना पड़ता। कार्तिक मास में तुलसी के पौधे के नीचे राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर पूरे भाव के साथ पूजा करनी चाहिए। यदि आंवले का पेड़ है तब उसके नीचे भी राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर पूरे श्रद्धा भाव से पूजन करना चाहिए। विधिपूर्वक स्नान करने के लिए जब दो घड़ी रात बाकी बच जाए तब तुलसी की मिट्टी, वस्त्र और कलश लेकर जलाशय या गंगा तट अथवा पवित्र नदी के किनारे जाकर पैर धोने चाहिए तथा गंगा जी के साथ अन्य पवित्र नदियों का ध्यान करते हुए विष्णु, शिव आदि देवताओं का ध्यान करना चाहिए। उसके बाद नाभि तक जल में खड़े होकर निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:- कार्तिकेऽहं करिष्यामि प्रात: स्नानं जनार्दनं। प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह॥ अर्थात- हे जनार्दन देवेश्वर ! लक्ष्मी सहित आपकी प्रसन्नता के लिए मैं कार्तिक प्रात: स्नान करुँगा। उसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करें:- गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे। नम: कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने॥ नमस्तेऽस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते॥ अर्थात- आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्य को श्रीराधाजी सहित स्वीकार करें। हे हरे! आप कमलनाभ को नमस्कार है, जल में शयन करने वाले आप नारायण को नमस्कार है। इस अर्घ्य को स्वीकार कीजिए। आपको बारम्बार नमस्कार है। व्यक्ति किसी भी जलाशय में स्नान करे, उसे स्नान करते समय गंगा जी का ही ध्यान करना चाहिए। सबसे पहले मृत्तिका (मिट्टी आदि से स्नान कर ऋचाओं द्वारा अपने मस्तक पर अभिषेक करें। अघमर्षण और स्नानांग तर्पण करें तथा पुरुष सूक्त द्वारा अपने सिर पर जल छिड़कें। इसके बाद जल से बाहर निकलकर दुबारा अपने मस्तक पर आचमन करना चाहिए और कपड़े बदलने चाहिए। कपड़े बदलने के बाद तिलक आदि लगाना चाहिए। जब कुछ रात बाकी रह जाए तब स्नान किया जाना चाहिए क्योंकि यही स्नान उत्तम कहलाता है तथा भगवान विष्णु को पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। सूर्योदय काल में किया गया स्नान मध्यम स्नान कहलाता है। कृत्तिका अस्त होने से पहले तक का स्नान उत्तम माना जाता है। बहुत देर से किया गया स्नान कार्तिक स्नान नहीं माना जाता है। मनीषियों द्वारा चार प्रकार के स्नान कहे गए हैं:- 1. वायव्य स्नान, 2. वारुण स्नान, 3. ब्राह्म स्नान तथा 4. दिव्य स्नान। वायव्य स्नान:- जिस स्नान को गोधूलि द्वारा किया जाए वह वायव्य स्नान कहलाता है। वारुण स्नान:- जो स्नान समुद्र आदि के जल से किया जाए वह वारुण स्नान कहलाता है। ब्राह्म स्नान:- वेद मन्त्रों के उच्चारण कर के जो स्नान किया जाता है उसे ब्राह्म स्नान कहते हैं। दिव्य स्नान:- मेघों तथा सूर्य की किरणों द्वारा जो जल शरीर पर गिरता है उसे दिव्य स्नान कहा जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के लिए मन्त्रोचारण करते हुए स्नान का विधान है। स्त्री तथा शूद्र को बिना मंत्रोच्चार के स्नान करना चाहिए। प्राचीनकाल में कार्तिक मास में पुष्कर का स्पर्श पाकर नन्दा परम धाम को प्राप्त हुई थी। राजा प्रभंजन भी कार्तिक मास में पुष्कर में स्नान करने से व्याघ्र योनि से मुक्त हुए थे। अत: कार्तिक मास में जो मनुष्य प्रात:काल उठकर तीर्थ में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्योग्य और अयोग्य संतान के योग
1. यदि माता-पिता की कुंडली में पंचम भाव का मालिक छठे ,आठवे ,बारहवे भाव या उसके मालिक से योग करें अथवा किसी भी प्रकार का संबंध बनाएं तो संतान पिता का विरोध करने वाली होती है। इस योग में अच्छे ग्रहो के प्रभाव अनुसार न्यूनता आती है। 2. यदि माता-पिता की कुंडली में पंचम भाव या पंचमेश पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव माता-पिता को मानसिक तनाव और संताप देने वाली संतान प्राप्ति कराता है। 3. यदि माता-पिता की कुंडली मे पंचम भाव और पंचमेश पर गुरु की दृष्टि और पंचम भाव पर अच्छे ग्रहों की दृष्टि राशि संतान को जन्म देती है जो माता-पिता का नाम रोशन करती है इस योग को चन्द्रमा से पंचम भाव के अनुसार भी देखना चाहिए। 4. माता-पिता की कुंडली में पंचमेश का बल और उसकी केंद्र या त्रिकोण की स्थिति संतान से प्राप्त होने वाली खुशियों की ओर इशारा करती है। 5. यदि माता-पिता की कुंडली में गुरु पंचमेश है और सूर्य अच्छी स्थिति में हो तो संतान योग्य होती है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*जानिए वो उपाय, कैसे कर्ज में डूबे धन वापस आये?*
कर्ज से मुक्ति कैसे हो इस पर आपलोगो को बहुत सारे उपाय बता चुंका हूँ।अब आज आपको बताता हूँ की आपने जो पैसे किसी को उधार दिया है वो वापस नहीं मिल रहे है। तो उसके लिए क्या उपाय किया जाये....? दो बहुत छोटे से सरल से उपाय आप लोग करके देखें।कभी कभी ऐसा भी होता है ये छोटे से उपाय देखन में छोट लगते है पर काम भरपूर करते है।पूरी श्रद्धा से करे आपका जाना कुछ नहीं है।अगर काम बन गया तो पाना ही है। (1)प्रतिदिन प्रात: स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरें और उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें। इसके बाद उक्त जल को सूर्य को अर्पित करें।अर्पित करते वक्त 'ॐ आदित्याय नमः' का जाप करते हुए सूर्य भगवान से धन वापिसी की प्रार्थना करें। (2)सर्वप्रथम काले रंग का कार्बन पेपर लाये।आटे का दिया बना लीजिये और तिल्ली का तेल ले लीजिये।अब किसी भी दिन सायंकाल गोधूलि बेला में घर पर कार्बन पेपर लगा कर जिससे अपना पैसा लेना है उसका नाम लिखे और ओरिजनल पेपर तह कर जेब में रखे और कार्बन वाले पेपर को रोल करके बत्ती की तरह बना ले।इसके बाद आटे की दिया में तिल्ली का तेल डाल कर कार्बन पेपर वाला जो बत्ती बनाया था उसको दिया में डाल कर जला दे। और पूरा जल जाने दे।उसके बाद आने वाले शनिवार को उस व्यक्ति से अपना धन वापस मांगे न पूरा दे तो कुछ भी उससे मांग ले।एक बार शनिवार को उससे पैसा मिल गया तो समझिये आप का पैसा वापस मिलाना शुरू होजायेगा।और धीरे धीरे आपका धन निकल आएगा।अगर बीच में फिर से रूकावट आती है तो आप इस प्रक्रिया को दुबारा करे।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*पापांकुशा एकादशी*
महाभारत काल में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। यह एकादशी पाप का निरोध करती है, यानी कि पाप कर्मों से रक्षा करती है। पापाकुंशा एकादशी व्रत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन किया जाता है। पापाकुंशा एकादशी के दिन मनोवांछित फल कि प्राप्ति के लिये श्री विष्णु भगवान कि पूजा की जाती है। पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह स्वर्ग का भागी बनता है। इस एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है. श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम बनता है। पापांकुशा एकादशी व्रत की कथा अनुसार विन्ध्यपर्वत पर महा क्रुर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। जीवन के अंतिम समय पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी। दूतो ने यह बात उसे समय से पूर्व ही बता दी। मृत्युभय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया और यमलोक में जाना न पडे इसकी विनती करने लगा। अंगिरा ऋषि ने उसे आश्चिन मास कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने की सलाह देते हैं। इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को गया। पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है। *एकादशी महारानी की जय...*
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आपका कौनसा ग्रह खराब है।
आपका कौनसा ग्रह खराब है। आइये समझते है । जब आपका सूर्य ग्रह खराब हो सूर्य दोष के लक्षण असाध्य रोगों के कारण परेशानी सिरदर्द, बुखार, नेत्र संबंधी कष्ट सरकार के कर विभाग से परेशानी, नौकरी में बाधा आती है, ऐसी स्थिति मे आप सूर्य ग्रह से सम्बन्धी वस्तुओं का दान करे एवं आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। जब चंद्र ग्रह खराब हो तो क्या करें चंद्रमा दोष के लक्षण: जुकाम, पेट की बीमारियों से परेशानी घर में असमय दुधारू पशुओं की मत्यु की आशंका अकारण शत्रुओं का बढ़ना, धन का हानि,फेफड़े के रोग,बिना वजह मानसिक तनाव इनसे बचाव हेतु चन्द्रमा की वस्तुओं का दान करे, शिव आराधना करें,किसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करें। मंगल जब खराब हो ऐसे जाने मंगल दोष के लक्षण: घर में चोरी होने का डर घर-परिवार में लड़ाई-झगड़े की आशंका भाई के साथ संबंधों में अनबन दांपत्य जीवन में तनाव, अकाल मृत्यु की आशंका, जमीन विवाद, श्री बजरँगबली की सेवा करे,मंगल की वस्तुओं का दान करे, मंगलवार व्रत रखें, सात्विक भोजन करें । जब बुध खराब हो कैसे जाने बुध दोष के लक्षण: स्वभाव में चिड़चिड़ापन जुए-सट्टे के कारण धन की बड़ी हानि दांत से जुड़े रोगों के कारण परेशानी सिर दर्द के कारण अधिक तनाव की स्थिति बहन, बुआ, बेटी की स्थिति खराब, त्वचा रोग बढ़ते जायेगे इस स्थिति मे बुध का दान करे,देवी पाठ करे, हरे वृक्षों की सेवा करे, घर मे तुलसीजी की सेवा करें जब गुरु खराब हो कैसे जाने गुरू दोष के लक्षण: सोने की हानि, चोरी की आशंका उच्च शिक्षा की राह में बाधाएं झूठे आरोप के कारण मान-सम्मान में कमी पिता को हानि होने की आशंका कन्या की शादी मैं परेशानी ऐसी स्थिति मैं गुरु का दान करे। बुजुर्गो ,ब्राह्मणों, सन्तो के चरण छूकर आशीर्वाद ले। पीपल या केले की पूजा करें । जब शुक्र खराब हो कैसे जाने शुक्र दोष के लक्षण: बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबंधी रोगों से परेशानी राजनीति के क्षेत्र में हानि, प्रेम व दापंत्य संबंधों में अलगाव जीवनसाथी के स्वास्थ्य को लेकर तनाव। यौन सम्बन्धी समस्याएं। समझ लीजिये शुक्र खराब है। श्री सूक्त का पाठ करे, गाय को ज्वार खिलावें । मन्दिर मैं घी,कपूर, रुई की बत्ती,इतर दान करे। जब शनिदेव खराब हो पता करें शनि दोष के लक्षण: पैतृक संपत्ति की हानि, हमेशा बीमारी से परेशानी मुकदमे के कारण परेशानी बनते हुए काम का बिगड़ जाना घुटनो के नीचे दर्द, समझ लीजिये शनिदेव अप्रसन्न हैं । शनिदेव को शनिवार सांय तेल, उड़द, काली तिल अर्पित करे, विकलांग की सेवा करे, काली गाय को रोटी दे । जब राहु खराब हो पता करे राहु दोष के लक्षण: शराब, नशे की लत लगना, भगवान के प्रति नास्तिक, गैस बनना, मोटापेके कारण परेशानी अचानक दुर्घटना, लड़ाई-झगड़े की आशंका हर तरह के व्यापार में घाटा कुबुद्धि होना सर्प का दिखना समझ जाएं राहू खराब हैं। मां सरस्वती की आराधना करें ऊं ऐं सरस्वत्यै नम मंत्र का 1 माला जाप करें तांबेके बर्तन में गुड़, गेहूं भरकर बहते जल में प्रवाहित करें माता से संबंध मधुर रखें। जब केतु खराब हो पता करें केतु दोष के लक्षण: बुरी संगत के कारण धन का हानि जोड़ों के दर्द से परेशानी संतान का भाग्योदय न होना, स्वास्थ्य के कारण तनाव कुत्ते का काटना क्या करें भगवान गणेश की आराधना करें ऊं गं गणपतये नम मंत्र का 1 माला जाप करें गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें दो रंगे कुत्ते को रोटी दे। गरीब को दोरंगा कम्बल दान करे। अब आप समझ गए होंगे कि आपका कौनसा ग्रह खराब है और किस ग्रह की वस्तुओं का दान करना है । आपके जीवन मे आ रही अधिकतर समस्याओं के कारक आप खुद ही हो । जब आप माता पिता, स्त्री, गुरुजन आदि के प्रति अपशब्द बोलते या उनके साथ दुर्व्यवहार करते हो । ये सभी आपको प्रतिउत्तर मैं कुछ नही कहते पर इनके मन से निकली टीस आपके जीवन मैं जहर का काम करती है । कौन कैसा है ये जरूरी नही हम कैसे है ये सोचो?
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्र में नवम दिवस"माँ सिद्धिदात्री"पूजन एवं कथा*
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं- माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है। हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।
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