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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*!! कार्तिक स्नान का विधान!!*
*!! कार्तिक स्नान का विधान!!* कार्तिक स्नान आश्विन माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अगले माह कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस पवित्र स्नान को आरंभ करने से पहले आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी आने पर भगवान विष्णु को प्रणाम कर कार्तिक व्रत करने की आज्ञा लेनी चाहिए। इस तरह से आज्ञा लेने से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने भक्त पर कृपा कर उसे आत्मिक बल तथा मनोबल प्रदान करते हैं। साथ ही ईश्वर अपने भक्त को विधिपूर्वक कार्तिक व्रत करने की सद्बुद्धि देते हैं। सभी बारह मासों में मार्गशीर्ष मास को अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है, उससे भी अधिक पुण्य देने वाला वैशाख मास कहा गया है। प्रयाग में माघ मास का अधिक महत्व है तथा इससे भी महान तथा अधिक फलदायी कार्तिक मास को कहा गया है। जब ब्रह्मा जी ने एक तरफ सभी प्रकार के दान, व्रत तथा नियम रखे और दूसरी ओर कार्तिक का स्नान रखकर तौला तो कार्तिक स्नान का पलड़ा ही भारी पाया। भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए आश्विन की पूर्णिमा से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तक प्रतिदिन गंगा जी में स्नान करना चाहिए। यदि गंगा जी नहीं है तब किसी भी नदी, तालाब अथवा पोखर आदि में कार्तिक स्नान करना चाहिए। यदि कुछ भी नहीं है तब नियमित रुप से घर पर ही स्नान करना चाहिए। देवी पक्ष अर्थात भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्रि आने तक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के लिए आश्विन कृष्ण चतुर्थी से लेकर कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक नियमपूर्वक स्नान करना चाहिए। भगवान जनार्दन को प्रसन्न करने के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। जो मनुष्य जाने-अनजाने कार्तिक मास में नियम से स्नान करते हैं, उन्हें कभी यम-यातना को नहीं देखना पड़ता। कार्तिक मास में तुलसी के पौधे के नीचे राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर पूरे भाव के साथ पूजा करनी चाहिए। यदि आंवले का पेड़ है तब उसके नीचे भी राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर पूरे श्रद्धा भाव से पूजन करना चाहिए। विधिपूर्वक स्नान करने के लिए जब दो घड़ी रात बाकी बच जाए तब तुलसी की मिट्टी, वस्त्र और कलश लेकर जलाशय या गंगा तट अथवा पवित्र नदी के किनारे जाकर पैर धोने चाहिए तथा गंगा जी के साथ अन्य पवित्र नदियों का ध्यान करते हुए विष्णु, शिव आदि देवताओं का ध्यान करना चाहिए। उसके बाद नाभि तक जल में खड़े होकर निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:- कार्तिकेऽहं करिष्यामि प्रात: स्नानं जनार्दनं। प्रीत्यर्थं तव देवेश दामोदर मया सह॥ अर्थात- हे जनार्दन देवेश्वर ! लक्ष्मी सहित आपकी प्रसन्नता के लिए मैं कार्तिक प्रात: स्नान करुँगा। उसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करें:- गृहाणार्घ्यं मया दत्तं राधया सहितो हरे। नम: कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने॥ नमस्तेऽस्तु हृषीकेश गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते॥ अर्थात- आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्य को श्रीराधाजी सहित स्वीकार करें। हे हरे! आप कमलनाभ को नमस्कार है, जल में शयन करने वाले आप नारायण को नमस्कार है। इस अर्घ्य को स्वीकार कीजिए। आपको बारम्बार नमस्कार है। व्यक्ति किसी भी जलाशय में स्नान करे, उसे स्नान करते समय गंगा जी का ही ध्यान करना चाहिए। सबसे पहले मृत्तिका (मिट्टी आदि से स्नान कर ऋचाओं द्वारा अपने मस्तक पर अभिषेक करें। अघमर्षण और स्नानांग तर्पण करें तथा पुरुष सूक्त द्वारा अपने सिर पर जल छिड़कें। इसके बाद जल से बाहर निकलकर दुबारा अपने मस्तक पर आचमन करना चाहिए और कपड़े बदलने चाहिए। कपड़े बदलने के बाद तिलक आदि लगाना चाहिए। जब कुछ रात बाकी रह जाए तब स्नान किया जाना चाहिए क्योंकि यही स्नान उत्तम कहलाता है तथा भगवान विष्णु को पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। सूर्योदय काल में किया गया स्नान मध्यम स्नान कहलाता है। कृत्तिका अस्त होने से पहले तक का स्नान उत्तम माना जाता है। बहुत देर से किया गया स्नान कार्तिक स्नान नहीं माना जाता है। मनीषियों द्वारा चार प्रकार के स्नान कहे गए हैं:- 1. वायव्य स्नान, 2. वारुण स्नान, 3. ब्राह्म स्नान तथा 4. दिव्य स्नान। वायव्य स्नान:- जिस स्नान को गोधूलि द्वारा किया जाए वह वायव्य स्नान कहलाता है। वारुण स्नान:- जो स्नान समुद्र आदि के जल से किया जाए वह वारुण स्नान कहलाता है। ब्राह्म स्नान:- वेद मन्त्रों के उच्चारण कर के जो स्नान किया जाता है उसे ब्राह्म स्नान कहते हैं। दिव्य स्नान:- मेघों तथा सूर्य की किरणों द्वारा जो जल शरीर पर गिरता है उसे दिव्य स्नान कहा जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के लिए मन्त्रोचारण करते हुए स्नान का विधान है। स्त्री तथा शूद्र को बिना मंत्रोच्चार के स्नान करना चाहिए। प्राचीनकाल में कार्तिक मास में पुष्कर का स्पर्श पाकर नन्दा परम धाम को प्राप्त हुई थी। राजा प्रभंजन भी कार्तिक मास में पुष्कर में स्नान करने से व्याघ्र योनि से मुक्त हुए थे। अत: कार्तिक मास में जो मनुष्य प्रात:काल उठकर तीर्थ में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्योग्य और अयोग्य संतान के योग
1. यदि माता-पिता की कुंडली में पंचम भाव का मालिक छठे ,आठवे ,बारहवे भाव या उसके मालिक से योग करें अथवा किसी भी प्रकार का संबंध बनाएं तो संतान पिता का विरोध करने वाली होती है। इस योग में अच्छे ग्रहो के प्रभाव अनुसार न्यूनता आती है। 2. यदि माता-पिता की कुंडली में पंचम भाव या पंचमेश पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव माता-पिता को मानसिक तनाव और संताप देने वाली संतान प्राप्ति कराता है। 3. यदि माता-पिता की कुंडली मे पंचम भाव और पंचमेश पर गुरु की दृष्टि और पंचम भाव पर अच्छे ग्रहों की दृष्टि राशि संतान को जन्म देती है जो माता-पिता का नाम रोशन करती है इस योग को चन्द्रमा से पंचम भाव के अनुसार भी देखना चाहिए। 4. माता-पिता की कुंडली में पंचमेश का बल और उसकी केंद्र या त्रिकोण की स्थिति संतान से प्राप्त होने वाली खुशियों की ओर इशारा करती है। 5. यदि माता-पिता की कुंडली में गुरु पंचमेश है और सूर्य अच्छी स्थिति में हो तो संतान योग्य होती है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*जानिए वो उपाय, कैसे कर्ज में डूबे धन वापस आये?*
कर्ज से मुक्ति कैसे हो इस पर आपलोगो को बहुत सारे उपाय बता चुंका हूँ।अब आज आपको बताता हूँ की आपने जो पैसे किसी को उधार दिया है वो वापस नहीं मिल रहे है। तो उसके लिए क्या उपाय किया जाये....? दो बहुत छोटे से सरल से उपाय आप लोग करके देखें।कभी कभी ऐसा भी होता है ये छोटे से उपाय देखन में छोट लगते है पर काम भरपूर करते है।पूरी श्रद्धा से करे आपका जाना कुछ नहीं है।अगर काम बन गया तो पाना ही है। (1)प्रतिदिन प्रात: स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरें और उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें। इसके बाद उक्त जल को सूर्य को अर्पित करें।अर्पित करते वक्त 'ॐ आदित्याय नमः' का जाप करते हुए सूर्य भगवान से धन वापिसी की प्रार्थना करें। (2)सर्वप्रथम काले रंग का कार्बन पेपर लाये।आटे का दिया बना लीजिये और तिल्ली का तेल ले लीजिये।अब किसी भी दिन सायंकाल गोधूलि बेला में घर पर कार्बन पेपर लगा कर जिससे अपना पैसा लेना है उसका नाम लिखे और ओरिजनल पेपर तह कर जेब में रखे और कार्बन वाले पेपर को रोल करके बत्ती की तरह बना ले।इसके बाद आटे की दिया में तिल्ली का तेल डाल कर कार्बन पेपर वाला जो बत्ती बनाया था उसको दिया में डाल कर जला दे। और पूरा जल जाने दे।उसके बाद आने वाले शनिवार को उस व्यक्ति से अपना धन वापस मांगे न पूरा दे तो कुछ भी उससे मांग ले।एक बार शनिवार को उससे पैसा मिल गया तो समझिये आप का पैसा वापस मिलाना शुरू होजायेगा।और धीरे धीरे आपका धन निकल आएगा।अगर बीच में फिर से रूकावट आती है तो आप इस प्रक्रिया को दुबारा करे।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*पापांकुशा एकादशी*
महाभारत काल में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था। यह एकादशी पाप का निरोध करती है, यानी कि पाप कर्मों से रक्षा करती है। पापाकुंशा एकादशी व्रत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन किया जाता है। पापाकुंशा एकादशी के दिन मनोवांछित फल कि प्राप्ति के लिये श्री विष्णु भगवान कि पूजा की जाती है। पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह स्वर्ग का भागी बनता है। इस एकादशी के दिन दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है. श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम बनता है। पापांकुशा एकादशी व्रत की कथा अनुसार विन्ध्यपर्वत पर महा क्रुर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। जीवन के अंतिम समय पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी। दूतो ने यह बात उसे समय से पूर्व ही बता दी। मृत्युभय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया और यमलोक में जाना न पडे इसकी विनती करने लगा। अंगिरा ऋषि ने उसे आश्चिन मास कि शुक्ल पक्ष कि एकादशी के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने की सलाह देते हैं। इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को गया। पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है। *एकादशी महारानी की जय...*
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आपका कौनसा ग्रह खराब है।
आपका कौनसा ग्रह खराब है। आइये समझते है । जब आपका सूर्य ग्रह खराब हो सूर्य दोष के लक्षण असाध्य रोगों के कारण परेशानी सिरदर्द, बुखार, नेत्र संबंधी कष्ट सरकार के कर विभाग से परेशानी, नौकरी में बाधा आती है, ऐसी स्थिति मे आप सूर्य ग्रह से सम्बन्धी वस्तुओं का दान करे एवं आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। जब चंद्र ग्रह खराब हो तो क्या करें चंद्रमा दोष के लक्षण: जुकाम, पेट की बीमारियों से परेशानी घर में असमय दुधारू पशुओं की मत्यु की आशंका अकारण शत्रुओं का बढ़ना, धन का हानि,फेफड़े के रोग,बिना वजह मानसिक तनाव इनसे बचाव हेतु चन्द्रमा की वस्तुओं का दान करे, शिव आराधना करें,किसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करें। मंगल जब खराब हो ऐसे जाने मंगल दोष के लक्षण: घर में चोरी होने का डर घर-परिवार में लड़ाई-झगड़े की आशंका भाई के साथ संबंधों में अनबन दांपत्य जीवन में तनाव, अकाल मृत्यु की आशंका, जमीन विवाद, श्री बजरँगबली की सेवा करे,मंगल की वस्तुओं का दान करे, मंगलवार व्रत रखें, सात्विक भोजन करें । जब बुध खराब हो कैसे जाने बुध दोष के लक्षण: स्वभाव में चिड़चिड़ापन जुए-सट्टे के कारण धन की बड़ी हानि दांत से जुड़े रोगों के कारण परेशानी सिर दर्द के कारण अधिक तनाव की स्थिति बहन, बुआ, बेटी की स्थिति खराब, त्वचा रोग बढ़ते जायेगे इस स्थिति मे बुध का दान करे,देवी पाठ करे, हरे वृक्षों की सेवा करे, घर मे तुलसीजी की सेवा करें जब गुरु खराब हो कैसे जाने गुरू दोष के लक्षण: सोने की हानि, चोरी की आशंका उच्च शिक्षा की राह में बाधाएं झूठे आरोप के कारण मान-सम्मान में कमी पिता को हानि होने की आशंका कन्या की शादी मैं परेशानी ऐसी स्थिति मैं गुरु का दान करे। बुजुर्गो ,ब्राह्मणों, सन्तो के चरण छूकर आशीर्वाद ले। पीपल या केले की पूजा करें । जब शुक्र खराब हो कैसे जाने शुक्र दोष के लक्षण: बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबंधी रोगों से परेशानी राजनीति के क्षेत्र में हानि, प्रेम व दापंत्य संबंधों में अलगाव जीवनसाथी के स्वास्थ्य को लेकर तनाव। यौन सम्बन्धी समस्याएं। समझ लीजिये शुक्र खराब है। श्री सूक्त का पाठ करे, गाय को ज्वार खिलावें । मन्दिर मैं घी,कपूर, रुई की बत्ती,इतर दान करे। जब शनिदेव खराब हो पता करें शनि दोष के लक्षण: पैतृक संपत्ति की हानि, हमेशा बीमारी से परेशानी मुकदमे के कारण परेशानी बनते हुए काम का बिगड़ जाना घुटनो के नीचे दर्द, समझ लीजिये शनिदेव अप्रसन्न हैं । शनिदेव को शनिवार सांय तेल, उड़द, काली तिल अर्पित करे, विकलांग की सेवा करे, काली गाय को रोटी दे । जब राहु खराब हो पता करे राहु दोष के लक्षण: शराब, नशे की लत लगना, भगवान के प्रति नास्तिक, गैस बनना, मोटापेके कारण परेशानी अचानक दुर्घटना, लड़ाई-झगड़े की आशंका हर तरह के व्यापार में घाटा कुबुद्धि होना सर्प का दिखना समझ जाएं राहू खराब हैं। मां सरस्वती की आराधना करें ऊं ऐं सरस्वत्यै नम मंत्र का 1 माला जाप करें तांबेके बर्तन में गुड़, गेहूं भरकर बहते जल में प्रवाहित करें माता से संबंध मधुर रखें। जब केतु खराब हो पता करें केतु दोष के लक्षण: बुरी संगत के कारण धन का हानि जोड़ों के दर्द से परेशानी संतान का भाग्योदय न होना, स्वास्थ्य के कारण तनाव कुत्ते का काटना क्या करें भगवान गणेश की आराधना करें ऊं गं गणपतये नम मंत्र का 1 माला जाप करें गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें दो रंगे कुत्ते को रोटी दे। गरीब को दोरंगा कम्बल दान करे। अब आप समझ गए होंगे कि आपका कौनसा ग्रह खराब है और किस ग्रह की वस्तुओं का दान करना है । आपके जीवन मे आ रही अधिकतर समस्याओं के कारक आप खुद ही हो । जब आप माता पिता, स्त्री, गुरुजन आदि के प्रति अपशब्द बोलते या उनके साथ दुर्व्यवहार करते हो । ये सभी आपको प्रतिउत्तर मैं कुछ नही कहते पर इनके मन से निकली टीस आपके जीवन मैं जहर का काम करती है । कौन कैसा है ये जरूरी नही हम कैसे है ये सोचो?
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्र में नवम दिवस"माँ सिद्धिदात्री"पूजन एवं कथा*
माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं- माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है। हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्र का अष्टम दिवस"माँ महागौरी" पूजन-कथा*
माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है। माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं। वहाँ पहुँचे तो वहाँ पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं। एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं- “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।" महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहाँ पहुँचा जहाँ देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परन्तु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमजोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं। माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए। महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से आर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए। अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने माँ की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं। पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत् की ओर प्रेरित करके असत् का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*शारदीय नवरात्रि का सप्तम दिवस*
*शारदीय नवरात्रि का सप्तम दिवस* आज मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं. मां कालरात्रि का स्वरूप बहुत ही विकराल और डरावना है. उनका वर्ण काला है. वह शत्रुओं में भय पैदा कर देने वाली देवी हैं. शत्रुओं का काल हैं. इस वजह से उनको कालरात्रि कहा जाता है. मां दुर्गा ने रक्तबीज के वध के समय कालरात्रि का स्वरूप धारण किया था. गर्दभ पर सवार, खुले केश वाली, हाथों में कटार और व्रज धारण करने वाली मां कालरात्रि की पूजा करने से भय दूर होता है, संकटों से रक्षा होती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है. शुभफल प्रदान करने के कारण इनका एक नाम शुभंकरी भी है. इस देवी की आराधना से अकाल मृत्यु का डर भी भाग जाता है, रोग और दोष भी दूर होते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुंभ और निशुंभ नामक दो दानव थे जिन्होंने देवलोक में तबाही मचा रखी थी। इस युद्ध में देवताओं के राजा इंद्रदेव की हार हो गई और देवलोक पर दानवों का राज हो गया। तब सभी देव अपने लोक को वापस पाने के लिए माँ पार्वती के पास गए। जिस समय देवताओं ने देवी को अपनी व्यथा सुनाई उस समय देवी अपने घर में स्नान कर रहीं थीं, इसलिए उन्होंने उनकी मदद के लिए चण्डी को भेजा। जब देवी चण्डी दानवों से युद्ध के लिए गईं तो दानवों ने उनसे लड़ने के लिए चण्ड-मुण्ड को भेजा। तब देवी ने माँ कालरात्रि को उत्पन्न किया। तब देवी ने उनका वध किया जिसके कारण उनका नाम चामुण्डा पड़ा। इसके बाद उनसे लड़ने के लिए रक्तबीज नामक राक्षस आया। वह अपने शरीर को विशालकाय बनाने में सक्षम था और उसके रक्त (खून) के गिरने से भी एक नया दानव (रक्तबीज) पैदा हो रहा था। तब देवी ने उसे मारकर उसका रक्त पीने का विचार किया, ताकि न उसका खून ज़मीन पर गिरे और न ही कोई दूसरा पैदा हो। माता कालरात्रि को लेकर बहुत सारे संदर्भ मिलते हैं। आइए हम उनमें से एक बताते हैं कि देवी पार्वती दुर्गा में कैसे परिवर्तित हुईं? मान्यताओं के मुताबिक़ दुर्गासुर नामक राक्षस शिव-पार्वती के निवास स्थान कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती की अनुपस्थिति में हमला करने की लगातार कोशिश कर रहा था। इसलिए देवी पार्वती ने उससे निपटने के लिए कालरात्रि को भेजा, लेकिन वह लगातार विशालकाय होता जा रहा था। तब देवी ने अपने आप को भी और शक्तिशाली बनाया और शस्त्रों से सुसज्जित हुईं। उसके बाद जैसे ही दुर्गासुर ने दोबारा कैलाश पर हमला करने की कोशिश की, देवी ने उसको मार गिराया। इसी कारण उन्हें दुर्गा कहा गया। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं। देवी की पूजा से शनि के बुरे प्रभाव कम होते हैं। पूजा विधि, मंत्र, भोग आदि मां कालरात्रि पूजा का मंत्र ज्वाला कराल अति उग्रम शेषा सुर सूदनम।त्रिशूलम पातु नो भीते भद्रकाली नमोस्तुते।। ॐ देवी कालरात्र्यै नमः। प्रार्थना मंत्र एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा। वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥ स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ध्यान मंत्र करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥ दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्। अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥ महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा। घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥ सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्। एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥ स्त्रोत हीं कालरात्रि श्रीं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती। कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥ कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी। कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥ क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी। कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥ कवच मंत्र ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि। ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥ रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम। कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥ वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि। तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥ मां कालरात्रि का प्रिय फूल और रंग इस देवी को लाल रंग प्रिय है. इसलिए इनकी पूजा में लाल गुलाब या लाल गुड़हल का फूल अर्पित करना चाहिए. हालांकि इनको रातरानी का फूल भी चढ़ाना शुभ होता है. मां कालरात्रि का प्रिय भोग नवरात्रि के सातवे दिन की पूजा में माता कालरात्रि को आप गुड़ का भोग लगाएं. इससे देवी कालरात्रि प्रसन्न होती है. मां कालरात्रि की पूजा का महत्व १. मां कालरात्रि भयानक दिखती हैं लेकिन वे शुभ फल देने वाली हैं. २.मां कालरात्रि से काल भी भयभीत होता है. ये देवी अपने भक्तों को भय ये मुक्ति और अकाल मृत्यु से भी रक्षा करती हैं. ३.शत्रुओं के दमन के लिए भी इस देवी की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि की पूजा विधि आज प्रात:स्नान के बाद व्रत और मां कालरात्रि के पूजन का संकल्प लें. उसके बाद मां कालरात्रि को जल, फूल, अक्षत्, धूप, दीप, गंध, फल, कुमकुम, सिंदूर आदि अर्पित करते हुए पूजन करें. इस दौरान मां कालरात्रि के मंत्र का उच्चारण करते रहें. उसके बाद मां को गुड़ का भोग लगाएं. फिर दुर्गा चालीसा, मां कालरात्रि की कथा आदि का पाठ करें. फिर पूजा का समापन मां कालरात्रि की आरती से करें. पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना करें और जो भी मनोकामना हो, उसे मातारानी से कह दें. ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्रि का षष्ठम दिवस "माँ कात्यायनी पूजन"*
कात्यायनी नवदुर्गा देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवें रूप है। यह अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हैमावती, इस्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतांजलि के महाभाष्य में किया गया है, जिसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखी गयी थी। उनका वर्णन देवी-भागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका-पुराण (१०वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है। परंपरागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी में उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं। ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है। नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए। 'या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ अर्थ : हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है। विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र- ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ! नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:। माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मांतर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्र का पंचम दिवस पर स्कंदमाता कथा-*
*नवरात्र का पंचम दिवस पर स्कंदमाता कथा-* स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। भगवान स्कंद 'कुमार कार्तिकेय' नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। स्कंदमाता की चार भुजाएँ हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है। बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है। नवरात्रि-पूजन के पाँचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। माँ स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक् परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है। हमें एकाग्रभाव से मन को पवित्र रखकर माँ की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिए। इस घोर भवसागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में पाँचवें दिन इसका जाप करना चाहिए। माँ ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध' चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं। सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*नवरात्र के चतुर्थ दिवस पर*🚩कुष्मांडा : मां दुर्गा की चौथी शक्ति की पावन कथा🚩
नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। मां की उपासना का मंत्र सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे। इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा कहते हैं। माँ कुष्मांडा की कथा पौराणिक कथा के अनुसार जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है। इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। ये देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है। विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। ये देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख-समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए। नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा अर्चना की जाती है।कूष्मांडा मां सूर्य से सम्बंधित दोषों को ठीक करती हैं। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य नीच का हो उन्हें मां कूष्मांडा की पूजा से लाभ होता है। !! जय माँ त्रिपुरा!!
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्!!नवरात्र तृतीय दिवस-मां चंद्रघंटा की व्रत कथा!!
शास्त्र के अनुसार जब देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चल रहा था तब असुरों का स्वामी महिषासुर ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर इंद्र का सिंहासन छीन लिया और खुद स्वर्ग का स्वामी बन बैठा। इसे देखकर सभी देवता गण काफी दुखी हुए। स्वर्ग से निकाले जाने के बाद सभी देवतागण इस समस्या से निकलने के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। वहां जाकर सभी देवताओं ने असुरों के किए गए अत्याचार और इंद्र, चंद्रमा, सूर्य, वायु और अन्य देवताओं के सभी छीने गए अधिकार के बारे में भगवान को बताया। देवताओं ने भगवान को बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण स्वर्ग लोक तथा पृथ्वी पर अब विचरन करना असंभव हो गया है। तब यह सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव शंकर अत्यंत क्रोधित हो गए। उसी समय तीनो भगवान के मुख से एक ऊर्जा उत्पन्न हुई। देवतागणों के शरीर से निकली हुई उर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई। यह ऊर्जा दसों दिशाओं में व्याप्त होने लगी। तभी वहां एक कन्या उत्पन्न हुई। तब शंकर भगवान ने देवी को अपना त्रिशूल भेट किया। भगवान विष्णु ने भी उनको चक्र प्रदान किया। इसी तरह से सभी देवता ने माता को अस्त्र-शस्त्र देकर सजा दिया। इंद्र ने भी अपना वज्र एवं ऐरावत हाथी माता को भेंट किया। सूर्य ने अपना तेज, तलवार और सवारी के लिए शेर प्रदान किया। तब देवी सभी शास्त्रों को लेकर महिषासुर से युद्ध करने के लिए युद्ध भूमि में आ गई। उनका यह विशाल का रूप देखकर महिषासुर भय से कांप उठा। तब महिषासुर ने अपनी सेना को मां चंद्रघंटा के पर हमला करने को कहा। तब देवी ने अपने अस्त्र-शस्त्र से असुरों की सेनाओं को भर में नष्ट कर दिया। इस तरह से मां चंद्रघंटा ने असुरों का वध करके देवताओं को अभयदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गई। ........🌹चंद्रघंटा माता की आरती🌹....... : जय मां चंद्रघंटा सुख धाम, पूर्ण कीजो मेरे काम जय मां चंद्रघंटा सुख धाम पूर्ण कीजो मेरे काम चंद्र समान तू शीतल दाती चंद्र तेज किरणों में समाती क्रोध को शांत बनाने वाली मीठे बोल सिखाने वाली मन की मालक मन भाती हो चंद्र घंटा तुम वरदाती हो सुंदर भाव को लाने वाली हर संकट मे बचाने वाली हर बुधवार जो तुझे ध्याये श्रद्धा सहित जो विनय सुनाय मूर्ति चंद्र आकार बनाएं सन्मुख घी की ज्योत जलाएं शीश झुका कहे मन की बाता पूर्ण आस करो जगदाता कांची पुर स्थान तुम्हारा करनाटिका में मान तुम्हारा नाम तेरा रटू महारानी 'भक्त' की रक्षा करो भवानी 🌹मां चंद्रघंटा मंत्र हिंदी अर्थ🌹 या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आपकों नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। प्रथम दिवस -- माँ शैलपुत्री कथा
नवरात्रि पूजन के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नंदी नामक वृषभ पर सवार ‘शैलपुत्री’ के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके। अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष के घर की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थीं। तब इनका नाम ‘सती’ था और इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना- अपना यज्ञ- भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया। किन्तु दक्ष ने शंकरजी को इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यन्त विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं तो वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा – प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया है। उनके यज्ञ- भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु जान- बूझकर हमें नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकरजी के इस उपदेश से सती को कोई बोध नहीं हुआ और पिता का यज्ञ देखने, माता- बहनों से मिलने की इनकी व्यग्रता किसी भी प्रकार कम न हुई। उनका प्रबल आग्रह देखकर अंतत: शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे ही दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल सती की माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से सती के मन को बहुत क्लेश पहुँचा। सती ने जब देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है और दक्ष ने भी उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन कहे। यह सब देखकर सती का ब्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा और उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहां आकर मैने बहुत बड़ी भूल की है। सती अपने पति भगवान शंकर जी का अपमान न सह सकीं और उन्होंने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगग्नि द्वारा भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दु:खद समाचार को सुनकर शंकरजी ने अतिक्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णतया: विध्वंस करा दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे “शैलपुत्री” नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व- भंजन किया था। “शेलपुत्री” देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की ही भांति वे इस बार भी शिवजी की ही अर्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं ।।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*श्रीजगज्जनन्यै दुर्गादेव्यै नमः*
*श्रीजगज्जनन्यै दुर्गादेव्यै नमः* शारदीयनवरात्रमहोत्सवम् उपलक्ष्य सपरिवारं भवद्भ्यः भूरिशः हार्दिक्यः शुभाषया:। पर्व इदं भवतां कृते कुशलक्षेमकरं भूयात् इति कामयेsहम् ! *!!साधकों के लिये नवरात्र में साधना निर्देश!!* संपूर्ण नवरात्र में श्रीरामरक्षास्तोत्र को👇🏼 *आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्।।* *लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।* इस श्लोक से प्रति श्लोक श्रीरामरक्षास्तोत्र को संपुटित १०८ आवृत्ति पाठ कर दशांश हवन,तर्पण, मार्जन एवं कन्या,ब्राह्मण भोजन करवायें *सभी समस्याओं का समाधान तथा सुख समृद्धि का अनन्तकाल तक वास होगा ऐसा मुझें दृढ़ विश्वास हैं।*
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*शारदीय नवरात्र घट स्थापना करने की सही विधि, सामग्री, मुहूर्त्त*
26 सितम्बर 2022 को दिन सोमवार को शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ है इस दिन कलश स्थापना या घटस्थापना के साथ ही मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ होती है. 26 सितंबर को आप प्रात:काल में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त 6:21 बजे से सुबह 7:57 बजे पर्यन्त नवरात्रि कलश स्थापना कर सकते हैं. अभिजित मुहूर्त में कलश स्थापना करें, यह भी उत्तम मुहूर्त होता है. अभिजित मुहूर्त दिन में 11:55 बजे से दोपहर 12:42 बजे तक है. *कलश स्थापना विधि और सामग्री* नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए लाल रंग का आसन, मां भगवती की अष्टधातु की मूर्ति, फोटो फ्रेम, माता की चुनरी वस्त्र आदि, मिट्टी का घड़ा या कलश, जौ, शुद्ध मिट्टी, मौली कलावा, कपूर, रोली, हरी इलायची, लौंग, साबुत सुपारी, अक्षत्, अशोक या आम के पांच पत्ते, दुर्वांकुर, चांदी के सिक्के, लाल चुनरी, सिंदूर, नारियल, फल-फूल, श्रृंगार पिटारी और फूलों की माला अखंड ज्योत के लिए दीपक शुद्ध देसी घी कलावा बाती. जाप करने के लिए माला *घट स्थापना की सही विधि* प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर अपने घर परिवार की सुख शांति के लिए 9 दिन के व्रत का संकल्प किया जाता है. व्रत का संकल्प लेने के पश्चात ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही कलश स्थापना की जाती है, कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर कर कलश के ऊपर नारियल को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कर अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्तो सहित रखना चाहिए. सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं अब एक परत जौ की बिछाएं इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं अब फिर एक परत जौ की बिछाएं जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें अब कलश में गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल कंठ तक भर दें कलश में साबुत सुपारी, लौंग का एक जोड़ा, हल्दी की गांठ, दूर्वांकुर, अक्षत, चांदी का सिक्का डालें कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें ढक्कन में चावल भर दें और कलश के ऊपर भी कुछ सिक्के भी रख दें नारियल पर लाल कपड़ा, मोली लपेट दें अब नारियल को कलश पर रखें अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें स्थापित कलश में सबसे पहले गणेश गौरी का आवाहन और पूजन करें फिर वरूण देव, नवग्रह मंडल, मां भगवती का आह्वान कर पूजन करना चाहिए और प्रार्थना करें कि हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें” अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें धूपबत्ती कलश को दिखाएं कलश को माला अर्पित करें कलश को फल, फूल मिठाई आदि अर्पित करें *कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है* नवरात्री के प्रथम दिन एक लकड़ी की चौकी की स्थापना करनी चाहिए इसको गंगाजल से पवित्र करके इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछाना चाहिए कलश को अपने बायीं ओर ईशान कोण में रखें, अखंड ज्योत को दाईं ओर अग्नि कोण में रखना चाहिए उसके बाद माँ भगवती की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा का फ्रेम किया हुआ फोटो स्थापित करना चाहिए माँ दुर्गा को लाल चुनरी उढ़ायें अब माँ दुर्गा से प्रार्थना करें कि “हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी पर विराजिये” उसके बाद सबसे पहले माँ को दीपक दिखाइए उसके बाद कुमकुम अक्षत फूल माला धूप,दीप इत्र, नैवेद्य समर्पित करें ऋतु के अनुसार फल, मिठाई अर्पित करें इसके बाद शांति से बैठ कर नवार्ण मंत्र ( *ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे* ) की एक माला का जाप करें दुर्गा सप्शती का पाठ अवश्य करें. मां भगवती के निमित्त स्तोत्र, चालीसा आदि का पाठ भी श्रृद्धा पूर्वक करें मां भगवती आप सभी का कल्याण करें सभी सुखी रहें स्वस्थ रहें...
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*सर्वपितृ दर्श अमावस्या और पितृ विसर्जन सर्व पितृ अमावस्या और पितृ विसर्जन विधि के बारे मे.....*
सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन होता है. यह पितरों की विदाई का दिन होता है इसे पितृ विसर्जन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है, सर्व पितृ अमावस्या है. हिन्दू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की अमावस्या पितृ अमावस्या भी कहलाती है. इस दिन श्राद्ध पक्ष का समापन होता है और पितृ लोक से आए हुए पितृजन अपने लोक लौट जाते हैं. पितृ विसर्जन अमावस्या के दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान आदि से पितृजन तृप्त होते हैं और जाते समय अपने पुत्र, पौत्रों और परिवार को आशीर्वाद देकर जाते हैं! मान्यता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि गुरुवार का दिन पितरों के विसर्जन के लिए उत्तम माना जाता है. इस दिन पितरों को विदा करने से पितृ देव बहुत प्रसन्न होते हैं, क्योंकि यह मोक्ष देने वाले भगवान विष्णु की पूजा का दिन माना जाता है इस कारण सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितरों का विसर्जन विधि विधान से किया जाना चाहिए। माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से नमन कर अपने पितरों को विदा करता है उसके पितृ देव उसके घर-परिवार में खुशियां भर देते हैं. जिस घर के पितृ प्रसन्न होते हैं पुत्र प्राप्ति और मांगलिक कार्यक्रम उन्हीं घरों में होते हैं. पितृ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर बिना साबुन लगाए स्नान करें और फिर साफ-सुथरे कपड़े पहनें पितरों के तर्पण के निमित्त सात्विक पकवान बनाएं और उनका श्राद्ध करें, शाम के समय सरसों के तेल के चार दीपक जलाएं इन्हें घर की चौखट पर रख दें। एक दीपक लें एक लोटे में जल लें अब अपने पितरों को याद करें और उनसे यह प्रार्थना करें कि पितृपक्ष समाप्त हो गया है इसलिए वह परिवार के सभी सदस्यों को आशीर्वाद देकर अपने लोक में वापस चले जाएं. यह करने के पश्चात जल से भरा लोटा और दीपक को लेकर पीपल की पूजा करने जाएं वहां भगवान विष्णु जी का स्मरण कर पेड़ के नीचे दीपक रखें जल चढ़ाते हुए पितरों के आशीर्वाद की कामना करें पितृ विसर्जन विधि के दौरान किसी से भी बात ना करें....।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्♦️जन्मकुण्डली में प्रशासनिक सेवा के ज्योतिषीय योग
ज्योतिष के माध्यम से किसी भी जातक/जातिका के आने वाले भविष्य, भूत, वर्तमान की जानकारी ग्रह, नक्षत्र आदि के आधार जानी जा सकती है।अच्छा कैरियर हो, भविष्य अच्छा हो यह इच्छा लगभग हर नोजवान इंसान ही होती है।इसी सम्बन्ध में प्रशासनिक सेवा से जुडे ग्रह, राशि के आधार पर जानकारी दी जा रही है। 🔸प्रशासनिक सेवा के लिए सूर्य, मंगल, गुरु, शनि का मुख्य रूप से बली और अनुकूल होना आवशयक होता है।सूर्य ग्रह प्रशासनिक सेवा में नेतृत्व करने की क्षमता और अच्छा प्रभाव जातक को प्रदान करता है।सरकारी नोकरी का प्रबल कारक भी सूर्य होता है। 🔸मंगल साहस और किसी भी कार्य को करने की शक्ति प्रदान करता है। 🔸गुरु ज्ञान का कारक है गुरु अच्छी समझ देता है। 🔸गुरु सूर्य दोनों नोकरी में उच्च पद प्राप्ति में सहायक होते है गुरु सूर्य के अच्छे प्रभाव से उच्च पद प्राप्ति आसानी से संभव हो जाती है। 🔸शनि जनता का कारक है।प्रशासनिक सेवाओ में जनता से अधिकारियों का सामना होता रहता है इस लिए जनता के कारक शनि की स्थिति अनुकूल होना भी अच्छा प्रभाव दर्शाता है। 🔸ग्रहो के बली और अनुकूल होने के बाद प्रशासनिक सेवा संबंधी कुंडली के भाव और भावेशों पर विचार करना भी जरुरी है। 🔹प्रशासनिक सेवाओ के लिए दशम भाव, नवम भाव, छठा भाव, तृतीय भाव और इन भावो के स्वामी बली होने चाहिए। 🔹दशम भाव उच्च पद, नौकरी का है तो नवम भाव जातक का भाग्य है किसी भी सम्बन्ध में फल प्राप्ति में भाग्य, नवम भाव का बली होना आवश्यक होता है। 🔹छठा भाव भी नौकरी और सेवा का है साथ ही प्रतियोगी परीक्षा का भाव भी छठा भाव ही है इस भाव और भावेश के बली होने पर नौकरी और प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलती है परीक्षा में सफल होने पर ही नौकरी प्राप्ति के मार्ग खुलते है। 🔹तृतीय भाव पराक्रम और जातक के साहस का है किसी भी कार्य को करने के लिए जातक कितनी मेहनत कर सकता है यह बात तृतीय भाव और इस भाव का स्वामी बताता है। 🔸प्रशासनिक सेवा में उच्च पद प्राप्ति के लिए जातक का शिक्षा का स्तर भी अच्छा होना अनिवार्य है।उच्च शिक्षा के आभाव में उच्च पद मिलना असंभव होता है।शिक्षा की अच्छी स्थिति के लिए शिक्षा के भाव दूसरा, चौथा, पाचवां और उच्च शिक्षा का भाव नवम भाव, भावेश व शिक्षा के कारक ग्रह गुरु, बुध, चंद्र आदि भी बली होने चाहिए।इन शिक्षा संबंधी भाव और कारक ग्रहो के बली होने पर उच्च शिक्षा प्राप्त होती है। 🔹दशम भाव में सूर्य बैठा हो सूर्य पर बली गुरु की दृष्टि हो, तब प्रशासनिक सेवा में उच्च पद के योग बनते है।दशमेश बली होकर केंद्र त्रिकोण भावो में सूर्य, गुरु, मंगल या सूर्य, गुरु, मंगल में से दो बली ग्रहो से युक्त या द्रष्ट हो तब उच्च पद प्राप्ति के योग बनते है। 🔹दशम भाव में सूर्य, मंगल अपनी बली राशि में बैठे हो, नवम भाव भी बली हो तब प्रशासनिक सेवा में उच्च पद प्राप्ति योग बनते है।यह प्रशासनिक सेवा संबंधी कुछ योग है इसके अतिरिक्त इन्ही ग्रह और भावेशों के द्वारा अन्य कई योग प्रशासनिक सेवा के बनते है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*आदित्यहृदयस्तोत्र*
आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। हर मनोकामना सिद्ध होती है। सरल शब्दों में कहें तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र हर क्षेत्र में चमत्कारी सफलता देता है। पढ़ें संपूर्ण पाठ... ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥ राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥ सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥5॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥7॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥ पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥ आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥ हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥11॥*ल हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥ आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥ नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥ जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥ नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥ ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥ तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥ तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥ नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23॥ देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥ पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥ अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान् ॥28॥ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥ *अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।*
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*शारदीय नवरात्रों में करें चमत्कारी ऋणमुक्ति के लिये ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र के पाठ*
ऋण से छुटकारा पाने हेतु ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र का नियमित १०८ पाठ करने से भक्त को कर्ज चुकाने में आसानी होती हैं। ॥ ध्यानम् ॥ ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम् । ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणामि देवम् ॥ ॥ मूल-पाठ ॥ सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजित: फल-सिद्धए । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चित: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ हिरण्य-कश्यप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चित: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ महिषस्य वधे देव्या गण-नाथ: प्रपुजित: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजित: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ भास्करेण गणेशो हि पूजितश्छवि-सिद्धए । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ शशिना कान्ति-वृद्धयर्थं पूजितो गण-नायक: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजित: । सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥ इदं त्वृण-हर-स्तोत्रं तीव्र-दारिद्र्य-नाशनं, एक-वारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं सामहित: । दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेर-समतां व्रजेत् ॥
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*!!अत्यति विचारणीय एवं चिन्तनीय!!*
*‼️अतिसंक्रमित हो चुके श्रीमद्भागवत को बचाने का सबसे सरल सर्वोत्तम उपाय‼️* 🔥उभयकुलपवित्र वेदधर्मशास्त्रनिष्ठ सदाचारी ब्राह्मण कथाव्यास श्रद्धापूर्वक स्वयं ही श्रीमद्भागवत का मूलपारायण करते हुए तदनुसार यथासाध्य व्याख्यान प्रस्तुत करें। निश्चित ही इस विधा में वेदशास्त्रसम्पन्न साधक ब्राह्मण से इतर की प्रवृत्ति काम नहीं कर सकती। आज के वर्णधर्मविहीन समय में प्रत्यक्षत: कोई किसी को मना नहीं कर सकता! विषयी ब्राह्मण कथावाचकों ने स्वयं ही अपने पैर तथा परम्परा पर कुठाराघात किया है। सावधान- आपने भागवत के नाम पर खूब भोग किया; तथापि आप भगवद्विग्रह को बचाने का प्रयास नहीं करेंगे तो आपको भयंकर दण्ड भोगने से कोई बचा नहीं सकता। आप जैसे अतिविषयी ठेकेदारों के कारण ही अब श्रीमद्भागवतकथा को छोड़ धड़ल्ले से बुद्धभागवत, गाँधीभागवत, हेडगेभागवत, अम्बेदभागवत, अग्रभागवत आदि की साप्ताहिक कथाएँ प्रचलित हो चुकी हैं! 🔥श्रीमद्भागवतकथायोजकों को भी ध्यान देना चाहिए कि स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मणों के द्वारा किया जाने वाला श्रीमद्भागवत का मूलपारायण ही धर्मानुष्ठान का मुख्य स्वरूप है; डुग्डुगी के ताल पर उछल-कूद करना मनोरञ्जन से अधिक कुछ भी नहीं! वह सत्सङ्ग है; सप्ताहपरायणानुष्ठान नहीं। जो ब्राह्मणव्यास भी मूलपारायण करने से प्रमाद करते हों उनसे आप भी दूर रहें; निश्चित ही वे तथाकथित व्यास श्रीमद्भागवतपरम्परा के रक्षक नहीं होंगे! शोचनीय- जिन्होंने प्रथमा-मध्यमा की भी कक्षाएँ नहीं देखी हैं; वे भी निर्लज्ज होकर भागवताचार्य लिख रहे हैं! कोई कहने-पूछने वाला नहीं! शास्त्र और शास्त्रज्ञों के संरक्षण से ही आपके श्रम और द्रव्य का चिरकालिक सदुपयोग हो सकता है। प्रतिदिन कथा से अतिरिक्त दो घण्टे का सार्वजनिक समय रखा जाय जिसमें कोई भी जिज्ञासु कथाव्यास से निर्बाधरूपेण धर्मदर्शनसम्बन्धी जिज्ञासा का समाधान प्राप्त करे। सारे अवैध कथावाचक स्वयं ही निरस्त हो जायँगे। जो अपने सामर्थ्यानुसार धर्म को बचाने का प्रयास करेगा; निश्चय ही धर्म उसकी रक्षा करता रहेगा। अन्यथा.....
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*पितरों के मोक्ष के लिये इन्दिरा एकादशी*
आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी इन्दिरा एकादशी कहलाती है। जब कभी श्राद्ध, श्रद्धा से न करके दबाव से किया जाता है या अयोग्य व्यक्ति के द्वारा श्राद्ध होता है तो श्राद्ध के बावजूद भी मुक्ति नहीं होती है। इस व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश होता है। ऐसे में इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है। यह भटकते हुए पितरों की गति सुधारने वाला व्रत है। इस दिन भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम जी की उपासना की जाती है। व्रती को शालिग्राम जी को तुलसी पत्र यानि तुलसी का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों और वैष्णवों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि एकादशी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। एकादशी का व्रत करने से विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न होते है। इस साल यह व्रत 5 अक्टूबर, शुक्रवार को है। एकादशी व्रत की विधि यह व्रत दशमी अर्थात एकादशी से एक रात पहले आरम्भ हो जाता है। दशमी की रात को भोजन नहीं किया जाता है। फिर एकादशी के पूरा दिन अन्न नहीं खाना चाहिए। व्रत को निराहार या फलाहार लेकर करें। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर व्यक्ति को पूर्णरुप से स्वच्छ हो जाना चाहिए। सूर्यदेव को अर्घ्य दें। उसके बाद भगवान विष्णु के विग्रह के समक्ष घी का दीप प्रज्जवलित करें। ईश्वर का ध्यान लगाकर भजन, चालीसा और आरती कर पूजा करें। एकादशी के व्रत का पारण एकादशी के अगले दिन सुबह किया जाता है। लेकिन व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि में पारण न किया जाए तो व्रत का फल व्रती को प्राप्त नहीं होता है। एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को वैष्णव धर्म का पालन करना चाहिए। इस दिन व्रती को नामजप अवश्य करना चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाएँ। भगवान विष्णु के समक्ष गीता का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। काँसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए। व्रती को अधिकांश समय भजन और प्रभु स्मरण में बिताना चाहिए। सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगाएँ। इस दिन विशेषतौर पर चावल नहीं खाने चाहिए। रात्रि में जागरण करना चाहिए। उपवास करने वाले व्यक्ति को प्याज, बैंगन, पान-सुपारी, लहसुन व मांस-मदिरा आदि नहीं खाने चाहिए। इन्दिरा एकादशी की कथा महिष्मतीपुरी के एक राजा थे इन्द्रसेन। धर्मपूर्वक प्रजा के उद्धार के लिए कार्य करते थे साथ ही हरि भक्त भी थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके दरबार में आए। राजा ने बहुत प्रसन्न हो उनकी सेवा की और आने का कारण पूछा। देवर्षि ने बताया कि मैं यम से मिलने यमलोक गया, वहाँ मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उन्होंने बताया कि व्रतभंग होने के दोष से वो यमलोक की यातनाएं झेलने को मजबूर है। इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भेजा है कि तुम उनके लिए इन्दिरा एकादशी का व्रत करो। ताकि वो स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकें। राजा ने पूछा- कृपा करके इन्दिरा एकादशी के संदर्भ में बताएँ। देवर्षि ने बताया कि आश्विन मास की यह एकादशी पितरों को सद्गति देने वाली है। एकादशी के दिन इस मंत्र का उच्चारण करें- अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः। श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥ व्रत में अपना पूरा दिन नियम-संयम के साथ बिताएँ। व्रती को इस दिन आलस्य त्याग कर भजन करना चाहिए। पितरों का भोजन निकाल कर गाय को खिलाएँ। फिर भाई-बन्धु, नाती और पु्त्र आदि को खिलाकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना। इस विधि से व्रत करने से आपके पिता की सद्गति होगी। राजा ने इसी प्रकार इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के फल से राजा के पिता को हमेशा के लिए बैकुण्ठ धाम का वास मिला और राजा भी मृत्योपरांत स्वर्गलोक गए। "जय श्रीहरि"
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*क्या करें जब कुंडली नहीं बनी हो अथवा जन्मदिनांक ज्ञात नहीं हों?*
अक्सर ऐसा होता है जब हमारा बुरा समय चल रहा हो तो हम किसी दैवज्ञ या ज्योतिषी की सहायता लेते हैं ! कुछ लोगों की जन्म कुंडली नहीं होती न ही उन्हें अपने जन्म समय का अच्छी तरह से ज्ञान होता है ! ऐसी दशा में कैसे पता लगाया जाए कि आप पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है ! कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जिनका सीधा सम्बन्ध किसी ख़ास योग या ग्रह से होता है, आइये आज उन समस्याओं पर चर्चा करते है जिससे हम ये जान सके कि हमारी जिंदगी में किस ग्रह की कौन सी समस्या आ रही है । ⭕अगर आपको अचानक धन हानि होने लगे ! आपके पैसे खो जाएँ, बरकत न रहे, दमा या सांस की बीमारी हो जाए, त्वचा सम्बन्धी रोग उत्पन्न हों, कर्ज उतर न पाए, किसी कागजात पर गलत दस्तखत से नुक्सान हो तो आप पर बुध ग्रह का कुप्रभाव चल रहा है ! क्या उपाय करें 💥💥💥💥 इसके लिए बुधवार को किन्नरों को हरे वस्त्र दान करें और गाय को हरा चारा इसी दिन खिलाएं ! ⭕अगर बुजुर्ग लोग आपसे बार बार नाराज होते हैं, जोड़ों मैं तकलीफ है, शरीर मैं जकरण या आपका मोटापा बढ़ रहा है, नींद कम है, पढने लिखने में परेशानी है किसी ब्रह्मण से वाद विवाद हो जाए अगर सोना गुम हो जाए पीलिया हो जाए या पुत्र पर संकट आ जाए तो निस्संदेह आप पर गुरु का अशुभ प्रभाव चल रहा है ! क्या उपाय करें 💥💥💥💥💥 ऐसी स्थिति में केसर का तिलक वीरवार से शुरू करके २७ दिन तक रोज लगायें, सामान्य अशुभता दूर हो जाएगी किन्तु गंभीर परिस्थितियों में जैसे अगर नौकरी चली जाए या पुत्र पर संकट, सोना चोरी या गुम हो जाए तो बृहस्पति के बीज मन्त्रों का जाप करें या करवाएं ! तुरंत मदद मिलेगी ! मंत्र का प्रभाव तुरंत शुरू हो जाता है ! साथ ही चने की दाल,गुड़,केले आदि का दान ब्राह्मण को करे। ⭕ अगर आपको वहम हो जाए, जरा जरा सी बात पर मन घबरा जाए, आत्मविश्वास मैं कमी आ जाए, सभी मित्रों पर से विशवास उठ जाए, ब्लड प्रेशर की बीमारी हो जाए, जुकाम ठीक न हो या बार बार होने लगे, आपकी माता की तबियत खराब रहने लगे ! अकारण ही भय सताने लगे और किसी एक जगह पर आप टिक कर ना बैठ सकें, छोटी छोटी बात पर आपको क्रोध आने लगे तो समझ लें की आपका चन्द्रमा आपके विपरीत चल रहा है ! क्या उपाय करें ☄☄☄☄☄ इसके लिए हर सोमवार का व्रत रखें और दूध या खीर का दान करें ! घर मे अनावश्यक जल बर्बाद न करे । माता का या बुजुर्ग महिला को सम्मान करें। ⭕ अगर आपकी स्त्रियों से नहीं बनती, किसी स्त्री से धोखा या मान हानि हो जाए, किसी शुभ काम को करते वक्त कुछ न कुछ अशुभ होने लगे, आपका रूप पहले जैसा सुन्दर न रहे ! लोग आपसे कतराने लगें ! वाहन को नुकसान हो जाए ! नीच स्त्रियों से दोस्ती, ससुराल पक्ष से अलगाव तथा शुगर हो जाए तो आपका *शुक्र* बुरा प्रभाव दे रहा है ! क्या उपाय करें ♣♣♣♣♣ उपाय के लिए महालक्ष्मीजी की पूजा करें, चीनी, चावल तथा चांदी शुक्रवार को किसी ब्राह्मण की पत्नी को भेंट करें, बड़ी बहन को वस्त्र दें, २१ ग्राम का चांदी का बिना जोड़ का कड़ा शुक्रवार को धारण करें ! अगर किसी के विवाह में देरी या बाधाएं आ रही हों तो जिस दिन रिश्ता देखने जाना हो उस दिन जलेबी को किसी नदी मैं प्रवाहित करके जाएँ ! इन में से किसी भी उपाय को करने से आपका शुक्र शुभ प्रभाव देने लगेगा ! किसी सुहागन को सुहाग का सामन देने से भी शुक्र का शुभ प्रभाव होने लगता है ! साथ ही किसी देवी मंदिर में घी कपूर रुई की बत्ती का दान करे। रोज एक रोटी पर घी लगाकर गाय को खिलावे । हर शुक्रवार गाय को ज्वार खिलावे । परन्तु ध्यान रहे, शुक्रवार को राहुकाल में कोई भी उपाय न करें ! ⭕ अगर आपके मकान में दरार आ जाए ! घर में प्रकाश की मात्रा कम हो जाए ! जोड़ों में दर्द रहने लगे विशेषकर घुटनों और पैरों में या किसी एक टांग पर चोट, रंग काला हो जाए, जेल जाने का डर सताने लगे, सपनों में मुर्दे या श्मशान दिखाई दे, आंखों मोतिया उतर आये, गठिया की शिकायत हो जाए, परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य गंभीर रूप से बीमार या मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो आप पर *शनि* का कुप्रभाव है । क्या उपाय करें 🌚🌚🌚🌚🌚 शनिवार को १ लीटर सरसों का तेल लोहे के कटोरे में डाल कर अपना मुह उसमे देख कर किसी काले वर्ण वाले ब्राह्मण को दान में दें ! ऐसा हर शनिवार करें ! बीमारी की अवस्था में किसी गरीब, बीमार व्यक्ति को दवाई दिलवाएं ! काली गाय की सेवा करे । मोहल्ले के किसी अपाहिज की मदद करे । मजदूर वर्ग का मेहनत का पैसा समय पर चुकाए। ⭕ अगर आपके बाल झड जाएँ और आपकी हड्डियों के जोड़ों मैं कड़क कड़क की आवाज आने लगे, पिता से झगडा हो जाए, मुकदमा या कोर्ट केस मैं फंस जाएँ, आपकी आत्मा दुखी हो जाए, आलसी प्रवृत्ति हो जाये तो आपको समझ लेना चाहिए की *सूर्य* का अशुभ प्रभाव आप पर हो रहा है ! क्या उपाय करें 🌳🌳🌳🌳🌳 ऐसी दशा मैं सबसे अच्छा उपाय है की हर सुबह लाल सूर्य को मीठा डालकर अर्ध्य दें ! इनकम टैक्स का भुगतान कर दें व पिता से सम्बन्ध सुधारने की कोशिश करें ! जगह जगह न थूके। रविवार बैल को गुड़ एवम गेंहु खिलावे । किसी देव मन्दिर में लाल फल सेवफल, अनार आदि का दान करे ।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*"पूजा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें"*
1. घर में सेवा पूजा करने वाले जन भगवान के एक से अधिक स्वरूप की सेवा पूजा कर सकते हैं। 02. घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश जी नहीं रखें। 03. शालिग्राम जी की बटिया जितनी छोटी हो उतनी ज्यादा फलदायक है। 04. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। 05. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता है। 06. पूजा में टूटे हुए अक्षत के टुकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए। 07. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती हैं। अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं। 08. तांबेके बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं। 09. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं। 10. दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है। 11. कुशा के अग्रभाग से देवताओं पर जल नहीं छिड़के। 12. देवताओं को अंगूठे से नहीं मलें। 13. चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें। 14. घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चावल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें। 15. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए। 16. श्री भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें। 17. श्री भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं। 18. लोहे के पात्र से श्री भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें। 19. हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें। 20. समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए। 21. छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं। 22. पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें। 23. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। 24. माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं। 25. माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए। 26. जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। 27. तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। 28. माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए। 29. ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए। 30. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं। 31. बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं। 32. एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। 33. सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। 34. बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। 35. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। 36. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। 37. जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। 38. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। 39. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। 40. यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। 41. शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। 42. कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। 43. भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। 44. देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। 45. किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। 46. एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए। 47. बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। 48. यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्श कर लेना चाहिए। 49. शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखें। 50. शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। 51. शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंकुम नहीं चढ़ती। 52. शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवीजी को आक तथा मदार और सूर्य भगवान को तगर के फूल नहीं चढ़ावे। 53. अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावें। 54. नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। 55. विष्णु भगवान को चांवल, गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। 56. पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। 57. किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। 58. पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। 59. सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। 60. गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। 61. पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। 62. दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। 63. सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिए। 64. पूजन करने वाले ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। 65. पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ----------:::×:::--------- "जय जय श्री राधे"
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्क्या आप बाहरी बाधा के शिकार तो नही?
आज का लेख विज्ञान से परे है इसलिये कृपया तर्क वितर्क ना करे । इस लेख का उद्देश्य नकारात्मक शक्तियों के प्रति जागृत करना मात्र है। कभी आपने देखा या सुना होगा कि मनुष्य शारीरिक, मानसिक और बाहरी (भूत-प्रेत) नजर इत्यादि बीमारियों से परेशान रहता है। शारीरिक बीमारी के लिए डॉक्टर या वैद्य के पास जाकर मनुष्य ठीक हो जाता है। मानसिक बीमारी का सरलतम उपाय हो जाता है।परन्तु कभी कभी डॉक्टर भी बीमारी को पकड़ नही पाता सारी मशीन फेल हो जाती दवाई कोई लागू नही होती तब मालूम पड़ता कि समस्या शारीरिक नही बाहरी है। क्या होती बाहरी बाधा 😱😱😱😱😱 मनुष्य जब भूत-प्रेत अथवा नजर, हाय या किसी दुष्ट आत्मा के जाल में फँस जाता है तब वह परेशान हो जाता है। इसके इलाज के लिए स्वयं एवं परिवार वाले हर जगह जाते हैं- जैसे तांत्रिक, मांत्रिक, जानकार के पास। परंतु मरीज ठीक नहीं होता है। मरीज की हालत बिगड़ने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मरीज शारीरिक एवं मानसिक दोनों बीमारी से ग्रस्त है। अक्सर सुनने में आता है कि उसके ऊपर भूत आ गया है या उसको प्रेत ने पकड़ लिया है जिसक कारण उसके घर वाले बहुत परेशान हैं। उसको संभाल ही नहीं पाते हैं। तान्त्रिक, मौलवी या ओझा के पास जाकर भी कुछ नहीं हुआ है। समझ नहीं आता है क्या करें..??? कितनी तरह की होती 😱😱😱😱😱😱 भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। कैसे बनते हैं भूत प्रेत 😱😱😱😱😱😱 अतृप्त आत्माएं बनती है भूत : जो व्यक्ति भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध, द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह भूत बनकर भटकता है। और जो व्यक्ति दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मरा है वह भी भूत बनकर भटकता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा को तृप्त करने के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जो लोग अपने स्वजनों और पितरों का श्राद्ध और तर्पण नहीं करते वे उन अतृप्त आत्माओं द्वारा परेशान होते हैं। किस जगह निवास करती अतृप्त आत्माएं 👿👿👿👿👿👿 कहां से आक्रमण करते हैं – भूत-प्रेत और मायावी शक्तियां ? भूत-प्रेतों का निवास नीचे दिए गए कुछ वृक्षों एवं स्थानों पर माना गया है। इन वृक्षों के नीचे एवं स्थानों पर किसी प्रकार की तेज खुशबू का प्रयोग एवं गंदगी नहीं करनी चाहिए, नहीं तो भूत-प्रेत का असर हो जाने की संभावना रहती है। पीपल वृक्ष:- शास्त्रों में इस वृक्ष पर देवताओं एवं भूत-प्रेतों, दोनों का निवास माना गया है। अतः कभी भी पीपल के पेड़ नहीं काटने चाहिए। इसी कारण हर प्रकार के कष्ट एवं दुख को दूर करने हेतु इसकी पूजा अर्चना करने का विधान है। मौलसिरी:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेतों का निवास माना गया है। कीकर वृक्ष:- इस वृक्ष पर भी भूत-प्रेत रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि तुलसीदास ने इस वृक्ष में रोज पानी डालकर इस वृक्ष पर रहने वाले प्रेत को प्रसन्न कर उसकी मदद से हनुमान जी के दर्शन प्राप्त कर प्रभु श्री राम से मिलने का सूत्र पाया था। यह भूत प्राणियों को लाभ पहुंचाने वाली श्रेणी का था। श्मशान या कब्रिस्तान:- इन स्थानों पर भी भूत-प्रेत निवास करते है। भूत-प्रेतों से सावधानी जल में भूत-प्रेतों का निवास होता है। इसलिए किसी भी स्त्री-पुरुष को नदी-तालाब में, चाहे वह कितने ही निर्जन स्थान में क्यों न हों, निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि भूत-प्रेत गंदगी से रुष्ट होकर मनुष्यों को नुकसान पहुंचाते हैं। कुएं में भी किसी प्रकार की गंदगी नहीं डालनी चाहिए क्योंकि कुंए में भी विशेष प्रकार के जिन्न रहते हैं जो कि रुष्ट होने पर व्यक्ति को बहुत कष्ट देते हैं। श्मशान या कब्रिस्तान में भी कभी कुछ नहीं खाना चाहिए और न ही वहां पर कोई मिठाई, सफेद व्यंजन, शक्कर या बूरा लेकर जाना चाहिए क्योंकि इनसे भी भूत-प्रेत बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं। ऐसे स्थानों में रात में कोई तीव्र खुशबू लेकर भी नहीं जाना चाहिए तथा मलमूल त्याग भी नहीं करना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति से विशेष रूप से दी गई इलायची, सेब, केला, लौंग आदि नहीं खानी चाहिए, क्योंकि यह भूत-प्रेत से प्रभावित करने के विशेष साधन माने गए हैं। अगर अंधेरा है तो उजाला भी है, नकारात्मकता का असर हो भी गया तो चिंता न करे ईश्वरीय शक्ति महान है सकारात्मकता जरूर आएगी ।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्*विश्वकर्मा पूजा* 17 सितम्बर 2022
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र धर्म थे। धर्म के पुत्र थे वास्तुदेव। वास्तुदेव और अंगिरस को जो पुत्र हुआ उसका नाम विश्वकर्मा था। वहीं स्कंद पुराण की एक कथा के अनुसार धर्म ऋषि के आठवें पुत्र प्रभास का विवाह देव गुरु बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मवादिनी से हुआ था। भगवान विश्वकर्मा इन्ही भुवना ब्रह्मवादिनी के पुत्र हैं। महाभारत में इनके जन्म का उल्लेख मिलता है। वराह पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने विश्वकर्मा को धरती पर उत्पन्न किया। विश्वकर्मा ने धरती पर महल, हवेली, वाहन, शस्त्र आदि का निर्माण किया, विश्वकर्मा जी ने इन्द्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्गलोक, लंका आदि का निर्माण किया था। इसलिए प्रत्येक वर्ष विश्वकर्मा जन्मोत्सव पर औजार, मशीनों और औद्योगिक इकाइयों की पूजा की जाती है। जगन्नाथ पूरी में “जगन्नाथ” मंदिर का निर्माण, पुष्पक विमान का निर्माण, सभी देवताओं के महलों का निर्माण, कर्ण का कुंडल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शंकर का त्रिशूल आदि का भी निर्माण विश्वकर्मा के द्वारा ही किया हुआ माना जाता है। भगवान विश्वकर्मा का परिवार ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 1. विश्वकर्मा की पुत्र से उत्पन्न हुआ महान कुल : राजा प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि 10 पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत ये 3 पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मन्वंतरों के अधिपति हुए। महाराज प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन ये 3 नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था। 2. विश्वकर्मा के पांच महान पुत्र: विश्वकर्मा के उनके मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ नामक पांच पुत्र थे। ये पांचों वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे। मनु को लोहे में, मय को लकड़ी में, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे में, शिल्पी को ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी में महारात हासिल थी। भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वकर्मा जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर तैयार हो जाएं। पूजा स्थल पर भगवान विश्वकर्मा की फोटो या मूर्ति स्थापित करें। पीले या फिर सफेद फूलों की माला भगवान विश्वकर्मा को पहनाएं। उनके समक्ष सुगंधित धूप और दीपक भी जलाएं। अब अपने सभी औजारों की एक-एक करके पूजा करें। भगवान विश्वकर्मा को पंचमेवा प्रसाद का भोग लगाएं। इसके बाद हाथ में फूल और अक्षत लेकर विश्वकर्मा भगवान का ध्यान करें। पूजा के समय इस मंत्र का उच्चारण करें: ॐ विश्वकर्मणे नमः जप के लिए रुद्राक्ष की माला होनी चाहिए। जप शुरू करने से पहले ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, इक्यावन सौ या ग्यारह हजार जप करने का संकल्प लें। ये आप पर निर्भर करता है कि आप कितनी बार जप करना चाहते हैं। आप चाहे तो किसी पुरोहित से भी जप संपन्न करा सकते हैं। विश्वकर्मा जी की आरती ~~~~~~~~~~~~~~~ ॐ जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा। सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक श्रुति धर्मा॥ ॐ जय. आदि सृष्टि में विधि को श्रुति उपदेश दिया। जीव मात्रा का जग में, ज्ञान विकास किया॥ ॐ जय. ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नहीं पाई। ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥ ॐ जय. रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना। संकट मोचन बनकर, दूर दु:ख कीना॥ ॐ जय. जब रथकार दंपति, तुम्हरी टेर करी। सुनकर दीन प्रार्थना, विपत हरी सगरी॥ ॐ जय. एकानन चतुरानन, पंचानन राजे। त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप सजे॥ ॐ जय. ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे। मन दुविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे॥ ॐ जय श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत गजानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ॐ जय. श्री विश्वकर्मा कथा ~~~~~~~~~~~ सूतजी बोले,प्राचीण समय की बात है,मुनि विश्वमित्र के बुलावे पर मुनि और सन्यासी लोग एक स्थान पर एकत्र हुए सभा करने के लिये। सभा मे,मुनि विश्वमित्र ने सभी को संबोधित किया। मुनि विश्वमित्र ने कहा कि,हे मुनियों आश्रमों में दुष्ट राक्षस यज्ञ करने वाले हमारे लोगों को अपना भोजन बना लेते,यज्ञों को नष्ट कर देतें है। जिसके कारण् हमारें पुजा-पाठ,ध्यान आदि में परेशानी हो रही है। इसलिए अब हमे तत्काल् उनके कुकृत्यों से बचने का कोई उपाय अवश्य करना चाहिए। मुनि विश्वमित्र की बातों को सुनकर वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि एक बार पहले भी ऋषि-मुनियों पर इस प्रकार का संकट आया था । उस समय् हम् सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गये थें। ब्रह्माजी ने ऋषि मुनियों को संकट से छुटकारा पाने के लिए उपाय बताया था।। ऋषि लोंगों ने ध्यानपूर्वक वशिष्ठ मुनि कि बातों को सुना और कहने लगे कि वशिष्ठ मुनि ने ठीक ही कहा है, हमें ब्रह्मदेव् के ही शरण में जाना जाना चाहिये। ऐसा सुन सब ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया। मुनियों के इस प्रकार कष्ट को सुनकर ब्रह्मा जी को बडां आश्चर्य हुआ,ब्रह्मा जी कहने लगे कि,हे मुनियों राक्षसों से तो स्वर्ग मे रहनें वाले देवता को भी भय लगता रहता है। फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या जो बुढापे और मृत्यु के दुखों में लिप्त रहतें हैं। उन राक्षसों को नष्ट करने में श्री विश्वकर्मा समर्थ है,आप लोग् श्री विश्वकर्मा के शरण में जाएँ। इस समय पृथ्वी पर अग्नि देवता के पुत्र मुनि अगिरा यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित हैं, और जो श्री विश्वकर्मा के भक्त है। वही आपके दुखों को दुर कर सकते हैँ,इसलिए हे मुनियों,आप उन्ही के पास जायें। सूतजी बोलें,ब्रह्मा जी के कथन के अनुसार मुनि लोग अगिंरा ऋषि पास गयें। मुनियों की बातों को सुनकर अगिंरा ऋषि ने कहा, हे मुनियों आप लोग क्यों व्यर्थ् मे इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहें है। दुखों को दुखों दुर करने मे विश्वकर्मा भगवान के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नही है। अमावस्या के दिन,आप लोग अपने साधारण कर्मों को रोक कर भक्ति पूर्वक “श्रीविश्वकर्मा कथा” सुनों उनकी उपासना करो। आपके सारे कष्टों को विश्वकर्मा भगवान अवश्य दुर करेंगे। महर्षि अगिंरा के बातों को सुनकर सभी लोग अपने-अपने आश्रमों को चले गये। तत्प्रश्चात् अमावस्या के दिन,मुनियों नें यज्ञ किया। यज्ञ में विश्वकर्मा भगवान का पूजन किया। “श्री विश्वकर्मा कथा” को सुना। जिसका परिणाम यह हुआ कि सारे राक्षस भस्म हो गए। यज्ञ विघ्नों से रहित हो गया,उनकें सारे कष्ट दुर हो गयें। जो मनुष्य भक्ति-भाव् से विश्वकर्मा भगवान की पूजा करता है,वह सुखों को प्राप्त करता हुआ संसार में बङे पद को प्राप्त करता है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्श्रीमद्भागवतान्तर्गत गजेन्द्रमोक्ष
श्रीमद्भागवतान्तर्गत गजेन्द्रमोक्ष ********** श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥ बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥ गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा – ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥ जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥ यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं । योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥३॥ जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥ यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम् अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्म मूलोsवत् मां परात्परः ॥४॥ अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥ कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु । तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥ समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥ न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम् । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥ भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥ दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम्वि मुक्त संगा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्य लोकव्रत मव्रणं वने भूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥ आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥ न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा न नाम रूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८॥ जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥ तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेsनन्तशक्तये । अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥ उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥ नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥ स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥ सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥ विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥ नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥ सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥ क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥ शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥ सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४॥ सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥ नमो नमस्तेsखिल कारणाय निष्कारणायाद्भुत कारणाय । सर्वागमान्मायमहार्णवाय नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥ सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥ गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय । नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥ जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥ मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय । स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥ मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥ आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्!!वन्दे धेनुमातरम् ,नमो गोभ्यः!!
इस आह्वान सन्देश👆🏻👆🏻 को सभी अपने स्टेटस पर लगाये तथा अन्य स्नेही स्वजनों को भी प्रेषित करें... ताकि गौमाता की आध्यात्मिक उपचार से मंत्रजप के चमत्कारिक प्रभाव से रक्षा हो सकें और सुनिये... ये गौमाता की रक्षा नहीं होगी बल्कि आपकी-हमारी रक्षा होंगी यहां तक की देवताओं की रक्षा भी होगी क्योंकि गावो विश्वस्य मातरः,सर्वदेवमयी हि गौः अर्थात् गौमाता विश्व की माता हैं एवं गौमाता ही सर्वदेमयी हैं अर्थात् सारे देवी-देवता गौमाता के शरीर में ही निवास करते हैं... सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा होंगी... क्योंकि गौमाता की रक्षा होगी तभी सर्वरक्षा सम्भव हैं। इसलिए इस उपरोक्त लेख👆🏻👆🏻 को स्टेटस अथवा सोशियल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करके,सभीं स्वजनों को प्रेषित करके पुण्यलाभ अर्जित करें। ✍🏻 वैदिक अमिताचार्य
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्!!मेरा निवेदन एवं आह्वान!!
अत्यति दुःख के साथ लिख रहा हूँ कि गौमाता के नाम पर अनेकों सरकारें बनीं लेकिन गौमाता के लिये कोई भी सरकार नहीं बनीं..गौमाता तो हमारें ठाकुरजी की भी ठाकुरजी हैं,गोपाल भी उद्धोषणापूर्वक कहते हैं कि गवां मध्ये वसाम्यहम् अर्थात् मैं गायों के बीच में रहूँ। ऐसी पूज्या गौमाता की उपेक्षा शासनतंत्र के द्वारा होना अत्यंत निंदनीय,चिन्तनीय हैं। तथा ऐसी दैत्यसरकार हमारें लिये बहिष्कारणीय हैं..आप सबका मैं आह्वान करता हूँ कि गौमाता के लिये आजसे ही हरिःशरणम् मन्त्र की ११ माला करना शुरू करें ताकि जिनका अमृततुल्य दूध हमनें पीया हैं,पी रहे हैं तथा पीते रहेंगे उसका यत्किंचित् ऋण तो भुगतान कर सकें। ✍🏻 वैदिक अमिताचार्य
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्!!अत्यंत चिंतनीय एवं विचारणीय!!सन्तानों को दोष न दे बल्कि दोषी आप स्वयं हैं।
बालक को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाया अंग्रेजी बोलना सिखाया, 'बर्थ डे' और *'मैरेज एनिवर्सरी' जैसे जीवन के शुभ प्रसंगों को अंग्रेजी संस्कृति के अनुसार जीने को ही श्रेष्ठ मानकर... माता पिता को *'मम्मा' और *'डैड' कहना सिखाया... जब अंग्रेजी संस्कृति से परिपूर्ण बालक बड़ा हो कर आपको समय नहीं देता, आपकी भावनाओं को नहीं समझता, आप को तुच्छ मान कर जुबान लडाता है और आप को बच्चों में कोई संस्कार नजर नहीं आता है, तब घर के वातावरण को गमगीन किए बिना या संतान को दोष दिए बिना कहीं एकान्त में जाकर रो लें... क्यों की... पुत्र की पहली वर्षगांठ से ही भारतीय संस्कारों के स्थान पर केक* कैसे काटा जाता है सिखाने वाले आप ही हैं...... हवन कुंड में आहुति कैसे डाली जाए,.. मंदिर,मंत्र, पूजा पाठ आदर सत्कार के संस्कार देने के बदले, केवल फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने को ही अपनी शान समझने वाले आप.. बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकला तो उसे,, *'प्रणाम आशीर्वाद के बदले *'बाय बाय' कहना सिखाने वाले आप.. परीक्षा देने जाते समय *इष्ट देव /बड़ों के पैर छूने के बदले *'Best of Luck' कह कर परीक्षा भवन तक छोड़ने वाले आप.. बालक के सफल होने पर घर में परिवार के साथ बैठ कर खुशियां मनाने के बदले,,, *होटल में पार्टी मनाने की प्रथा को बढ़ावा देने वाले आप.. बालक के विवाह के बाद *कुल देवता / देव दर्शन को भेजने से पहले... हनीमून के लिए *'फारेन /टूरिस्ट स्पॉट' भेजने की तैयारी करने वाले आप.. ऐसे ही ढेर सारी अंग्रेजी संस्कृतियों को हमने जाने अनजाने स्वीकार कर लिया है, अब तो बड़े बुजुर्गों और श्रेष्ठों के पैर छूने में भी शर्म आती है... गलती किसकी...?? मात्र आपकी (मां-बाप) की अंग्रेजी मात्र भाषा है... इसे सीखना है.. इसकी संस्कृति को जीवन में उतारना ~ नहीं है.. मानो तो ठीक.. नहीं तो भगवान ने जिंदगी दी है.. चल रही है, चलती रहेगी.. ||
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्श्राद्धपितृपक्ष विशेष जानकारी
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी जब सूर्य नारायण कन्या राशि में विचरण करते हैं तब पितृलोक पृथ्वी लोक के सबसे अधिक नजदीक आता है। श्राद्ध का अर्थ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से है। जो मनुष्य उनके प्रति उनकी तिथि पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार फलफूल, अन्न, मिष्ठान आदि से ब्राह्मण को भोजन कराते हैं। उस पर प्रसन्न होकर पितृ उसे आशीर्वाद देकर जाते हैं। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं, प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और द्वितीय पितृ पक्ष में जिस मास और तिथि को पितर की मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उसका दाह संस्कार हुआ है। वर्ष में उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। पितृपक्ष में जिस तिथि को पितर की मृत्यु तिथि आती है, उस दिन पार्वण श्राद्ध किया जाता है। पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, किंतु शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्यावंदन करने वाले ब्राह्मण को भोजन कराने की भी आज्ञा देते हैं। इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है। जैसे - रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं। सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है। दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता। ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं। पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है। धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है। श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है। श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले तर्पर्ण, ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है। इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं। श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है। श्राद्ध या पिण्डदान दोनो एक ही शब्द के दो पहलू है पिण्डदान शब्द का अर्थ है अन्न को पिण्डाकार मे बनाकार पितर को श्रद्धा पूर्वक अर्पण करना इसी को पिण्डदान कहते है दझिण भारतीय पिण्डदान को श्राद्ध कहते है। श्राद्ध के प्रकार 〰〰〰〰〰 शास्त्रों में श्राद्ध के निम्नलिखित प्रकार बताये गए हैं। 1👉 नित्य श्राद्ध : वे श्राद्ध जो नित्य-प्रतिदिन किये जाते हैं, उन्हें नित्य श्राद्ध कहते हैं. इसमें विश्वदेव नहीं होते हैं। 2👉 नैमित्तिक या एकोदिष्ट श्राद्ध : वह श्राद्ध जो केवल एक व्यक्ति के उद्देश्य से किया जाता है. यह भी विश्वदेव रहित होता है. इसमें आवाहन तथा अग्रौकरण की क्रिया नहीं होती है. एक पिण्ड, एक अर्ध्य, एक पवित्रक होता है। 3👉 काम्य श्राद्ध : वह श्राद्ध जो किसी कामना की पूर्ती के उद्देश्य से किया जाए, काम्य श्राद्ध कहलाता है। 4👉 वृद्धि (नान्दी) श्राद्ध : मांगलिक कार्यों ( पुत्रजन्म, विवाह आदि कार्य) में जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध या नान्दी श्राद्ध कहते हैं। 5👉 पार्वण श्राद्ध : यह श्राद्ध वह हैं जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष, प्रत्येक मास की अमावस्या आदि पर किये जाते हैं. ये विश्वदेव सहित श्राद्ध हैं। 6👉 सपिण्डन श्राद्ध : वह श्राद्ध जिसमें प्रेत-पिंड का पितृ पिंडों में सम्मलेन किया जाता है, उसे सपिण्डन श्राद्ध कहा जाता है। 7👉 गोष्ठी श्राद्ध : सामूहिक रूप से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे गोष्ठीश्राद्ध कहते हैं। 8👉 शुद्धयर्थ श्राद्ध : शुद्धयर्थ श्राद्ध वे हैं, जो शुद्धि के उद्देश्य से किये जाते हैं। 9👉 कर्मांग श्राद्ध : कर्मांग श्राद्ध वे हैं, जो षोडश संस्कारों में किये जाते हैं। 10👉 दैविक श्राद्ध : देवताओं की संतुष्टि की संतुष्टि के उद्देश्य से जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें दैविक श्राद्ध कहते हैं। 11👉 यात्रार्थ श्राद्ध : यात्रा के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे यात्रार्थ कहते हैं। 12👉 पुष्टयर्थ श्राद्ध : शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक पुष्टता के लिये जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें पुष्टयर्थ श्राद्ध कहते हैं। 13👉 श्रौत-स्मार्त श्राद्ध : पिण्डपितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहते हैं, जबकि एकोदिष्ट, पावर्ण, यात्रार्थ, कर्मांग आदि श्राद्ध स्मार्त श्राद्ध कहलाते हैं। कब किया जाता है श्राद्ध? 〰〰〰〰〰〰〰〰 श्राद्ध की महत्ता को स्पष्ट करने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है की श्राद्ध कब किया जाता है. इस संबंध में शास्त्रों में श्राद्ध किये जाने के निम्नलिखित अवसर बताये गए हैं । 1👉 भाद्रपद कृष्ण पक्ष के पितृपक्ष के 16 दिन। 2👉 वर्ष की 12 अमावास्याएं तथा अधिक मास की अमावस्या। 3👉 वर्ष की 12 संक्रांतियां। 4👉 वर्ष में 4 युगादी तिथियाँ। 5👉 वर्ष में 14 मन्वादी तिथियाँ। 6👉 वर्ष में 12 वैधृति योग। 7👉 वर्ष में 12 व्यतिपात योग। 8👉 पांच अष्टका। 9👉 पांच अन्वष्टका। 10👉 पांच पूर्वेघु। 11👉 तीन नक्षत्र: रोहिणी, आर्द्रा, मघा। 12👉 एक कारण : विष्टि। 13👉 दो तिथियाँ : अष्टमी और सप्तमी। 14👉 ग्रहण : सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण। 15👉 मृत्यु या क्षय तिथि। किसके निमित्त कौन कर सकता है श्राद्ध 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है। शास्त्रों में लिखा है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है। इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान का अधिकारी माना गया है और नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर मनुष्य करता है। इसलिए यहां जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है। 👉 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। 👉 पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। 👉 पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्पितर दोष है तो इस प्रकार की परेशानियां होती है
=======================पितर पक्ष यानी पूर्वजों की उपासना का एक पखवाड़े तक चलने वाला पर्व अब आरंभ हो चुका है, विभिन्न तिथियों पर लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं और पिंडदान करते हैं शास्त्रों में ऐसा बताया गया है कि हिंदू धर्म को मानने वाले हर घर में पितरों का श्राद्ध करना और उनके निमित्त तर्पण करना अनिवार्य बताया गया है। जिन घरों में ये बातें नहीं मानी जाती हैं, उन घरों में अशांति होती है, लोगों को कष्ट होता है और पितर दोष लगता है। मान्यता है कि पितर दोष होने पर कुछ विशेष प्रकार के लक्षण घरों में दिखते हैं। आइए जानते हैं क्या हैं ये लक्षण.... खाने में से बाल निकलना:- अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज ना करें। बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ ऐसा होता है कि उसके खाने में बार-बार बाल निकलता है। यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में बाल निकलता है। कई बार लोग उसका मजाक बनाने लगते हैं। यह सही नहीं है। अगर आपके साथ भी ऐसा हो तो किसी अच्छे ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखवाएं। घर से दुर्गंध आना:- कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्यस्थ हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है। पितरों के रूठे होने से ऐसा लक्षण दिख सकता है। इसकी जरा भी अनदेखी न करें। पूर्वजों का बार-बार स्वप्न में आना:- अक्सर कुछ लोगों के स्वप्न में ऐसा होता है कि उन्हें अपने मृत परिजन दिखाई देते हैं। ऐसा होना महज एक संयोग नहीं कहा जा सकता है। मान्यताएं कहती हैं पूर्वजों का बार-बार स्वप्न में आना उनकी कोई इच्छा अपूर्ण रहने का संकेत देता है। अगर आपके साथ भी ऐसा हो तो आपको अपने मृत परिजनों की पसंदीदा वस्तुएं जरूरतमंदों को दान करनी चाहिए। शुभ कार्य में बाधा आना:- अक्सर ऐसा होता है कि आप कोई शुभ कार्य करने जा रहे हैं तो उसमें बार-बार बाधा आ जाए। या उस वक्त कोई ऐसी घटना हो जाए कि आपका काम बीच में ही लटक जाए तो यह भी पूर्वजों के रुष्ट होने का संकेत देता है। कई बार होली दीवाली जैसे बड़े उत्सव में कुछ अशुभ घटनाएं हो जाती हैं, जो आपके पितरों की नाराजगी को दर्शाती हैं। अगर ऐसा आपके साथ हो तो आपको ब्राह्मण को घर बुलाकर सम्मान के साथ भोजन करवाना चाहिए और दान दक्षिणा देनी चाहिए। विवाह में देरी होना:- घर के किसी विवाह योग्य सदस्य के विवाह में देरी होना या फिर हर बार रिश्ता टूट जाना भी पितरों की असंतुष्टि को दर्शाता है। कई बार पितरों के रुष्ट होने से तलाक तक हो जाते हैं, इसलिए हर घर में पितरों का पूजन करना अनिवार्य माना गया है। संतान न होना:- अगर किसी वजह से आपके पूर्वज आपसे नाराज हैं या फिर जीतेजी उनके साथ अच्छा व्यवहार न किया गया हो तो ऐसे घरों में पितर दोष लगता है और कई बार इस दोष का संतानहीनता तक हो सकता है। इसलिए माता-पिता की सदैव सेवा करें और पूर्वजों के निमित्त दान-पुण्य अवश्य करें।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्श्राद्ध-पितृपक्ष विशेष जानकारी
पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं। पितृगणों की तृप्ति तथा आत्मकल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य ही करना चाहिये। जो श्राद्ध नहीं करता उसके पूर्वजों को तो कष्ट होता ही है अपितु जो इस कर्तव्य का त्याग करता है उसे भी पितृदोष रूपी दारुण दुःख भोगना पड़ता है। अतः श्राद्ध अवश्य ही करना चाहिये। यदि कोई पिण्डदान आदि विधि से श्राद्ध करने में असमर्थ होतो ब्राह्मण भोजन से पितरों को तृप्त कर सकता है। यदि इतना भी सामर्थ्य नहीं हो तो गौ को घास खिला देवे और इतना भी सामर्थ्य न हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दोनों हाथ उठाकर पितृगणों से प्रार्थना करें कि - हे मेरे पितृगणों! मेरे पास धन अन्नादि का सर्वथा अभाव है और मेरे पास आप को निवेदित करने हेतु श्रद्धा और भक्ति हैं मैं यही आपको निवेदित करता हूँ आप तृप्त हो जायें। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र, पत्नी, भाई, भतीजा, पिता, माता, पुत्रवधु, बहन, भानजा, सपिण्ड तथा सोदक क्रमशः पूर्व पूर्व के न रहने पर श्राद्ध के अधिकारी हैं। वर्षभर में श्राद्ध के अनेक अवसर उपस्थित होते हैं, परन्तु मृत्युतिथि तथा पितृपक्ष में श्राद्ध करना अनिवार्य है। गया श्राद्ध करने के पश्चात भी मृत्यु तिथि तथा श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध करना अनिवार्य है। वैष्णव जन एकादशी का श्राद्ध द्वादशी को करें तथा चतुर्दशी को जिनका श्राद्ध आता है वे चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध त्रयोदशी को करें क्योंकि चतुर्दशी को जिनकी अपमृत्यु होती है मात्र उनका ही श्राद्ध होता है चाहे किसी तिथि को मृत्यु हुई हो। सूर्यसिद्धांत आधारित श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पंचांगानुसार इस वर्ष 10 सितम्बर से 25 सितम्बर तक श्राद्ध की तिथियाँ निम्नानुसार हैं- 10 सितम्बर शनिवार पूर्णिमा श्राद्ध 11 सितम्बर रविवार प्रतिपदा श्राद्ध 12 सितम्बर सोमवार द्वितीया श्राद्ध, तृतीया श्राद्ध 13 सितम्बर मंगलवार चतुर्थी श्राद्ध 14 सितम्बर बुधवार पञ्चमी श्राद्ध, भरणी श्राद्ध 15 सितम्बर गुरुवार को कोई श्राद्ध नहीं है। 16 सितम्बर शुक्रवार षष्ठी श्राद्ध 17 सितम्बर शनिवार सप्तमी श्राद्ध 18 सितम्बर रविवार अष्टमी श्राद्ध 19 सितम्बर सोमवार नवमी श्राद्ध, मातृनवमी श्राद्ध, अन्वष्टका श्राद्ध 20 सितम्बर मंगलवार दशमी श्राद्ध 21 सितम्बर बुधवार एकादशी श्राद्ध 22 सितम्बर गुरुवार द्वादशी श्राद्ध, संन्यासी- यति श्राद्ध, वैष्णवानां एकादशी श्राद्ध 23 सितम्बर शुक्रवार त्रयोदशी श्राद्ध 24 सितम्बर शनिवार चतुर्दशी श्राद्ध (केवल शस्त्रहत आदि अपमृत्यु प्राप्त पितरों के लिए) 25 सितम्बर रविवार अमावस्या श्राद्ध, सर्वपितृ अमावस्या
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्पितरों के प्रतीक हैं ये 3 वृक्ष, 3 पक्षी, 3 पशु और 3 जलचर
धर्मशास्त्रों अनुसार पितरों का पितृलोक चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। दूसरी ओर अग्निहोत्र कर्म से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है। तीसरी ओर कुछ पितर हमारे वरुणदेव का आश्रय लेते हैं और वरुणदेव जल के देवता हैं। अत: पितरों की स्थिति जल में भी बताई गई है। ================================= ⚜️तीन वृक्ष:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 🚩1. पीपल का वृक्ष :- पीपल का वृक्ष बहुत पवित्र है। एक ओर इसमें जहां विष्णु का निवास है वहीं यह वृक्ष रूप में पितृदेव है। पितृ पक्ष में इसकी उपासना करना या इसे लगाना विशेष शुभ होता है। 🚩2. बरगद का वृक्ष :- बरगद के वृक्ष में साक्षात शिव निवास करते हैं। अगर ऐसा लगता है कि पितरों की मुक्ति नहीं हुई है तो बरगद के नीचे बैठकर शिव जी की पूजा करनी चाहिए। 🚩3. बेल का वृक्ष :- यदि पितृ पक्ष में शिवजी को अत्यंत प्रिय बेल का वृक्ष लगाया जाय तो अतृप्त आत्मा को शान्ति मिलती है। अमावस्या के दिन शिव जी को बेल पत्र और गंगाजल अर्पित करने से सभी पितरों को मुक्ति मिलती है।...इसके अलावा अशोक, तुलसी, शमी और केल के वृक्ष की भी पूजा करना चाहिए। ================================= ⚜️तीन पक्षी:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 🚩1. कौआ :- कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजन कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है। शास्त्रों के अनुसार कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में स्थित होकर विचरण कर सकती है। 🚩2. हंस :- पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना हैं जिन्होंने अपने जीवन में पुण्यकर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक चली जाती है। हो सकता है कि आपके पितरों ने भी पुण्य कर्म किए हों। 🚩3. गरुड़ :- भगवान गरुड़ विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरुड़ के नाम पर ही गुरुढ़ पुराण है जिसमें श्राद्ध कर्म, स्वर्ग नरक, पितृलोक आदि का उल्लेख मिलता है। पक्षियों में गरुढ़ को बहुत ही पवित्र माना गया है। भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ का आश्रय लेते हैं पितर।... इसके अलावा क्रोंच या सारस का नाम भी लिया जाता है। ================================= ⚜️तीन पशु:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 🚩1. कुत्ता :- कुत्ते को यम का दूत माना जाता है। कहते हैं कि इसे ईधर माध्यम की वस्तुएं भी नजर आती है। दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्य में होने वाली घटनाओं और ईथर माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है। कुत्ते को हिन्दू देवता भैरव महाराज का सेवक माना जाता है। कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। कुत्ते को रोटी देते रहने से पितरों की कृपा बनी रहती है। 🚩2. गाय :- जिस तरह गया में सभी देवी और देवताओं का निवास है उसी तरह गाय में सभी देवी और देवताओं का निवास बताया गया है। दरअसल मान्यता के अनुसार 84 लाख योनियों का सफर करके आत्मा अंतिम योनि के रूप में गाय बनती है। गाय लाखों योनियों का वह पड़ाव है, जहां आत्मा विश्राम करके आगे की यात्रा शुरू करती है। 🚩3. हाथी :- हाथी को हिन्दू धर्म में भगवान गणेश का साक्षात रूप माना गया है। यह इंद्र का वाहन भी है। हाथी को पूर्वजों का प्रतीक भी माना गया है। जिस दिन किसी हाथी की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। हाथियों को अपने पूर्वजों की स्मृतियां रहती हैं। अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन गजपूजा विधि व्रत रखा जाता है। सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वाले उस दिन हाथी की पूजा करते हैं।.. इसके अलावा वराह, बैल और चींटियों का यहां उल्लेख किया जा सकता है। जो चींटी को आटा देते हैं और छोटी-छोटी चिड़ियों को चावल देते हैं, वे वैकुंठ जाते हैं। ================================= ⚜️तीन जलचर जंतु:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 🚩1.मछली :- भगवान विष्णु ने एक बार मत्स्य का अवतार लेकर मनुष्य जाती के अस्त्वि को जल प्रलय से बचाया था। जब श्राद्ध पक्ष में चावल के लड्डू बनाए जाते हैं तो उन्हें जल में विसर्जित कर दिया जाता है। 🚩2. कछुआ :- भगवान विष्णु ने कच्छप का अवतार लेकर ही देव और असुरों के लिए मदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थापित किया था। हिन्दू धर्म में कछुआ बहुत ही पवित्र उभयचर जंतु है जो जल की सभी गतिविधियों को जानता है। 🚩3. नाग :- भारतीय संस्कृति में नाग की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि यह एक रहस्यमय जंतु है। यह भी पितरों का प्रतीक माना गया है।... इसके अलावा मगरमच्छ भी माना जाता है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की अराधना की जाती है, इस दिन चौदाह (14) गांठें बनाकर एक अनंत धागा बनाया जाता है, जिसकी पूजा करने के बाद उसे बाजु पर बांध लिया जाता है. अनंत चतुर्दशी के दिन ही हर जगह गणेश विसर्जन भी किया जाता है, मान्यता है कि भगवान ने भौतिक जगत में चौदहा लोक बनाए जिनमें भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक, अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल हैं, मान्यता है कि अनंतसूत्र के (14)गांठें 14 लोकों की प्रतीक होती हैं, यह भी मान्यता है कि जो चौदाह सालों तक लगातार अनंत चतुर्दशी का व्रत रखता है उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है, अनंत सूत्र को पुरुष दाहिने और महिलाएं बाएं हाथ में बांधती हैं, अनंत चतुर्दशी की कथा- इस व्रत का जिक्र पुराणों में भी मिलता है जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने अनंत चतुर्दशी व्रत करने की सलाह दी थी श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि अगर वह विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करेंगे तो इससे उनका सारा संकट दूर हो जाएगा और खोया राज्य फिर से प्राप्त हो जाएगा श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महत्ता समझाने के लिए एक कथा सुनाई, जो इस प्रकार है-- प्राचीन काल में सुमंत नामक एक तपस्वी ब्राह्मण थे, उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था दोनों की एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी, जिसका नाम सुशीला था सुशीला बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई पत्नी की मृत्यु के उपरांत सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया और सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया, विदाई के समय कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए, कौंडिन्य ऋषि अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर निकल पड़े रास्ते में ही शाम ढलने लग गई और ऋषि नदी के किनारे संध्या वंदन करने लगे, इसी दौरान सुशीला ने देखा कि बहुत सारी महिलाएं किसी देवता की पूजा कर रही थीं सुशीला ने महिलाओं से पूछा कि वे किसकी प्रार्थना कर रही हैं,इस पर उन लोगों ने उन्हें भगवान अनंत की पूजा करने और इस दिन उनका व्रत रखने के महत्व के बारे में बताया व्रत के महत्व के बारे में सुनने के बाद सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई, कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उन्होंने सारी बात बता दी कौंडिन्य ने यह सब कुछ मानने से मना कर दिया और पवित्र धागे को निकालकर अग्नि में डाल दिया,इसके बाद उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वह दुखी रहने लगे,इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कही पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े,तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले, "हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा तुम दुखी हुए अब तुमने पश्चाताप किया है मैं तुमसे प्रसन्न हूं अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो 14 वर्षों तक व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई, श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का चौदह वर्षों तक विधिपूर्वक व्रत किया और इसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए व चिरकाल तक राज्य करते रहे इसके बाद ही अनंत चतुर्दशी का व्रत प्रचलन में आया, अनंत पूजा का शुभ मुहूर्त- यह व्रत भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है,इसके लिए चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के पश्चात दो मुहूर्त में व्याप्त होनी चाहिए यदि चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के बाद दो मुहूर्त से पहले ही समाप्त हो जाए, तो अनंत चतुर्दशी पिछले दिन मनाए जाने का विधान है,इस व्रत की पूजा और मुख्य कर्मकाल दिन के प्रथम भाग में करना शुभ माने जाते हैं यदि प्रथम भाग में पूजा करने से चूक जाते हैं, तो मध्याह्न के शुरुआती चरण में करना चाहिए मध्याह्न का शुरुआती चरण दिन के सप्तम से नवम मुहूर्त तक होता है। अनंत चतुर्दशी पूजन विधि- अनंत चतुर्दशी के दिन सुबह स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त निराहार रहते हुए कलश की स्थापना करें और भगवान विष्णु की तस्वीर सामने रखें कलश पर कुश से निर्मित अनंत देव की स्थापना की जाती है, इसके आगे कुमकुम, केसर या हल्दी से रंगकर बनाया हुआ कच्चे डोरे का चौदह गांठों वाला अनंत भी रखा जाता है अगर आप खुद अनंत नहीं बना सकते तो बाजार से खरीदकर ले आएं इसके बाद अनंत देव की कथा भी सुनी जाती है मान्यता है कि व्रत रखने के साथ-साथ यदि विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने वाले की हर मनोकामना पूर्ण होती है,पूजा के अंत में एक बर्तन में दूध, सुपारी और अनंत सूत्र डालकर क्षीर मंथन होता है इसके बाद आरती की जाती है और अनंत देव का ध्यान करके अनंत सूत्र को पुरुष दाहिने और स्त्रियां बाएं हाथ में बांधती हैं अनंत सूत्र बांधने का मंत्र इस तरह है: अनंत संसार महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते।। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं और स्वयं प्रसाद ग्रहण करे
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्वास्तु के अनुसार ही घर में लगायें चित्र
घरों में तस्वीर या चित्र लगाने से घर सुंदर दिखता है, परंतु बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि घर में लगाए गए चित्र का प्रभाव वहां रहने वाले लोगों के जीवन पर भी पड़ता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में श्रृंगार, हास्य व शांत रस उत्पन्न करने वाली तस्वीरें ही लगाई जानी चाहिए। घर के अन्दर और बाहर सुन्दर चित्र , पेंटिंग , बेल- बूटे , नक्काशी लगाने से ना सिर्फ सुन्दरता बढती है , वास्तु दोष भी दूर होते है। 1- फल-फूल व हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें जीवन शक्ति का प्रतीक है। उन्हें पूर्वी व उत्तरी दीवारों पर लगाना शुभ होता है। इनसे जीवन में खुशहाली आती है। 2- लक्ष्मी व कुबेर की तस्वीरें भी उत्तर दिशा में लगानी चाहिए। ऐसा करने से धन लाभ होने की संभावना अधिक होती है। 3- यदि आप पर्वत आदि प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगाएं। 4- नदियों-झरनों आदि की तस्वीरें उत्तरी व पूर्वी दिशा में लगाना शुभ होता है। 5- युद्ध प्रसंग, रामायण या महाभारत के युद्ध के चित्र, क्रोध, वैराग्य, डरावना, वीभत्स, दुख की भावना वाला, करुण रस से ओतप्रोत स्त्री, रोता बच्चा, अकाल, सूखे पेड़ कोई भी चित्र घर में न लगायें। 6.घर का उत्तर पूर्व कोना (इशान कोण) स्वच्छ रखें व वंहा बहते पानी का चित्र लगायें | (ध्यान रहे इस चित्र में पहाड़/पर्वत न हो ) 7. उत्तर क्षेत्र की दीवार पर हरियाली या हरे चहकते हुए पक्षियों का शुभ चित्र लगाएं। ऐसा करने से परिवार के लोगों की एकाग्रता बनेगी साथ ही बुध ग्रह के शुभ परिणाम मिलेंगे। उत्तर दिशा बुध की होती है। 8.लक्ष्मी व कुबेर की तस्वीरें भी उत्तर दिशा में लगानी चाहिए। ऐसा करने से धन लाभ होने की संभावना है। 9. घर में जुडवां बत्तख व हंस के चित्र लगाना लगाना श्रेष्ठ रहता है। ऐसा करने से समृद्धि आती है। 10. घर की तिजोरी के पल्ले पर बैठी हुई लक्ष्मीजी की तस्वीर जिसमें दो हाथी सूंड उठाए नजर आते हैं, लगाना बड़ा शुभ होता है। तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम या ऑफ व्हाइट रखना चाहिए। 11.बच्चाा जिस तरफ मुंह करके पढता हो, उस दीवार पर मां सरस्वती का चित्र लगाएं। पढाई में रूचि जागृत होगी। 12 . अध्ययन कक्ष में मोर, वीणा, पुस्तक, कलम, हंस, मछली आदि के चित्र लगाने चाहिए। 13. बच्चों के शयन कक्ष में हरे फलदार वृक्षों के चित्र, आकाश, बादल, चंद्रमा अदि तथा समुद्र तल की शुभ आकृति वाले चित्र लगाने चाहिए। 14.फल-फूल व हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें जीवन शक्ति का प्रतीक है। उन्हें पूर्वी व उत्तरी दीवारों पर लगाएं। 15.ऐसे नवदम्पत्ति जो संतान सुख पाना चाहते हैं वे श्रीकृष्ण का बाल रूप दर्शाने वाली तस्वीर अपने बेडरूम में लगाएं। 16.यदि आप अपने वैवाहिक रिश्ते को अधिक मजबुत और प्रसन्नता से भरपूर बनाना चाहते हैं तो अपने बेडरुम में नाचते हुए मोर का चित्र लगाएं। 17.यूं तो पति-पत्नी के कमरे में पूजा स्थल बनवाना या देवी-देवताओं की तस्वीर लगाना वास्तुशास्त्र में निषिद्ध है फिर भी राधा-कृष्ण की तस्वीर बेडरूम में लगा सकते हैं। इसके साथ ही बांसुरी, शंख, हिमालय आदि के चित्र दाम्पत्य सुख में वृद्धि के कारक होते हैं। 18.कैरियर में सफलता प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में जंपिंग फिश, डॉल्फिन या मछालियों के जोड़े का प्रतीक चिन्ह लगाए जाने चाहिए। इससे न केवल बेहतर कैरियर की ही प्राप्ति होती है बल्कि व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है। 19.अपने शयन कक्ष की पूर्वी दीवार पर उदय होते हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए शुभ उर्जा वाले पक्षियों के चित्र लगाएं। निराश, आलस से परिपूर्ण, अकर्मण्य, आत्मविश्वास में कमी अनुभव करने वाले व्यक्तियों के लिए यह विशेष प्रभावशाली है। 20.स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिण की दीवार पर लगाने से सुख समृधि बढेगी 21.अग्नि कोण में रसोई घर नहीं हो, तो उस कोण में यज्ञ करते हुए ऋषि-विप्रजन की चित्राकृति लगानी चाहिए। 22.रसोई घर में माँ अन्नपूर्णा का चित्र शुभ माना जाता है। 23.मुख्य द्वार यदि वास्तु अनुरूप ना हो तो उस पर नक्काशी , बेल बूटे बनवाएं। 24.दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए घर में राधाकृष्ण की तस्वीर लगाएं। 25.पढने के कमरे में माँ सरस्वती , हंस , वीणा या महापुरुषों की तस्वीर लगाएं। 26.व्यापर में सफलता पाने के लिए कारोबार स्थल पर सफल और नामी व्यापारियों के चित्र लगाएं। 27.पूर्वजों की तस्वीर देवी देवताओं के साथ ना लगाएं। 28.दक्षिण मुखी भवन के द्वार पर नौ सोने या पीतल के नवग्रह यंत्र लगाए और हल्दी से स्वस्तिक बनाए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्श्री वामन द्वादशी~श्री वामन महोत्सव
वामन अवतार है जो पूर्ण निष्काम है.भगवान की लीलाएं भक्तों के हृदय को आनंद की रसधारा मेंनिमग्र कर देती हैं.भगवान के जन्म और कर्म दिव्य होते हैं.अनंत भगवान कीअनंत लीलाएं हैं । वामनभगवान का जन्म अदिति के गर्भ से होता है.दैत्यराज बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद कश्यप जी के कहने से माता अदिति"पयोव्रत" का अनुष्ठान करती हैं जो पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है.फिर भगवान, देवों काईष्ट सम्पादन करने के लिए और अपनी लीला करने के लिए" भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी"के दिन अवतरित हुए, तथा ब्राह्मण-ब्रह्मचारी बटुक कारूप धारण करते हैं.इसी उपलक्ष्य में यह दिन वामन-द्वादशी के रूप में मनाया जाताहै.उस समय अत्यंत आनन्दमयी वेला हो जाती है.चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर थे."अभिजित मुहूर्त"में भगवान का जन्म हुआ था. औरसभी ग्रह-नक्षत्र तथा तारे भगवान के मंगलमय जन्म को सूचित कर रहे थे. जन्म के पश्चात उनके जातकर्म, उपनयनआदि संस्कार संपन्नकिए गए.वामन बटुक कोमहर्षि पुलह ने"यज्ञोपवीत", अगस्त्य ने"मृगचर्म",मरीचि ने पलाश"दण्ड",आंगिरस ने"कुश"का बना वस्त्र, सूर्य ने"छत्र",भृगु ने"खड़ाऊं", बृहस्पति ने"जनेऊ"तथा"कमण्डलु", अदिति ने"कोपीन", सरस्वती ने"रुद्राक्ष माला"तथा कुबेर ने"भिक्षापात्र"प्रदान किए.अत: भगवान सौन्दर्य और तेज को विकीर्ण करते हुए सुशोभित हुए.उनके रूप की दिव्य छटा अत्यंत मनोहारी थी.उनका नाम था"उपेन्द्र",पर बाटुक रूप होने से सभी उन्हें"बाटुक वामन"कहते थे. जब वामन रूपधारी भगवान वासुदेव राजा बलि के यज्ञ की ओर चले,सभी ने भगवान का स्वागत किया तथा बलि ने भगवान को प्रसन्न करने हेतु अपना सब कुछ अर्पित करनेकी अभिलाषा प्रकट की.भगवान ने भी बलि के वंश की प्रशंसा करते हुए प्रह्लाद जैसे भक्त तथा बलि के पिता विरोचन को ब्राह्मïण वत्सल बताते हुए उसे भी उस परम्परा का पालन करने को कहा.तत्पश्चात भगवान ने बलि से अपने लिए अपने पैरों के माप की तीन पग भूमि मांगी.बलि ने संकल्प के लिए जल उठाया तो उसके गुरु शुक्राचार्य ने उसे ऐसा करने से रोका और स्पष्ट रूप से बता दिया कि ये स्वयं भगवान विष्णु हैं तथा देवताओं का हित साधने आए हैं.किन्तु बलि अपने वचन पर अडिग रहा. बलि ने कहा -गुरुदेव ये यदि भगवान विष्णु भी है तो भी मै इन्हें दान अवश्य दूँगा,क्योकि दुनिया जिनके द्वारे मांगने जाती है आज वे ही परमात्मा मेंरे द्वार पर भिक्षुक बनकर खड़े है चाहे ये मेरा सर्वस्व ही हरण क्यों न कर ले.जब 👉🏻गुरु शुक्राचार्य ने देखा कि राजा मेरी बात नहीं मानता तब वे संकल्प करनेवाले जल के पात्र में छोटा रोप रखकर बैठ गए कि 👉🏻जब जल ही नहीं निकलेगा तो संकल्प कैसे होगा?जैसे ही राजा ने जल के लिए पात्र को टेढा किया पानी नहीं आया.इस पर वामन भगवान बोले -राजन शायद मार्ग में कुछ अटक गया है 👉🏻झट अपने कुश केआसन से एक तीली निकली और बोले राजन रास्ता साफ़ कर लो इधर शुक्राचार्य टोटी में आँख लगाये बैठे थे जैसे ही राजा ने तीली डाली तो शुक्राचार्य जी की आँख ही फूट गई और वे झट से निकलकर वहाँ से चले गए.वास्तव में भगवान यहाँ बताना चाहते है कि स्वयं भी धर्म का काम न करो और यदिकोई दूसरा कर रहा हो तो उसे भी न करने दो जो इस प्रकार करता है,उसकी आँख शुक्राचार्य की भांति फूट जाती है.ये आँखे कौन सी है अन्दर की आँखे है ये,जोफूट जाती है इसलिए कोई करे तो उसे रोको मत.गुरु उसे ऐश्वर्यहीन होने का शाप देकर चले गए.बलि ने दान का संकल्प कर दिया.भगवान ने कहा बलि संकल्प क्या है वह बोलो -बलि बोले मेरे इस दान से भगवानविष्णु प्रसन्न हो यही मेरा संकल्प है.जो इतना सुना भगवान ने कि मेरे लिए दान कर रहा है और प्रसन्नता भी मेरी ही है भगवान बड़े प्रसन्न हुए. और प्रसन्नता में भगवान ने अपना आकार इतना बढ़ाया कि आज तक दान लेने के बाद कोईनहीं बढ़ा.सबने ने उनके विराट रूप का दर्शन किया.भगवान ने एक पग से समस्त पृथ्वी, आकाश व दिशाओं को ढक लिया. दूसरे पग में सारा स्वर्गलोक आ गया तथा तीसरे पग के लिए रंचमात्र भी स्थान न बचा.भगवान की इच्छा से गरुड़ ने बलि को वरुण पाश में बांध लिया.उन्होंने बलि से कहा-‘वचन पूरा न होने से तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा.’बलि ने कहा, -बलि तब भी नहीं डरे और बोले भगवान ‘आप तीसरा पग मेरे सिर पर रखें.’ आपके इस विराट स्वरुप में मैंने सबको देखा परन्तु मै उसमे नहीं हूँ,बलि तो केवल भगवान के प्रति प्रेम-निष्ठा बनाए रखने का इच्छुक था.तभी वहां बलि के दादा प्रह्लाद आते हैं और कहते हैं, ‘भगवान आपका लेना व देना दोनों सुंदर हैं.’ भगवान जब कृपा करते हैं तो तीन कदम यानि तीन चीजें मांगते हैं — तन, मन औरधन. जो उन्हें अर्पित कर देते हैं तो भगवान उनकी रक्षा स्वयं करते हैं. बलि ने धन विहीन, पीडि़त, बन्धनग्रस्त, गुरु-शापित होकर भी अपना धर्म व सत्य नहीं छोड़ा. वामन चरित्र का रहस्य है कि यद्यपि परमात्मा बड़े हैं, तब भी बलि के आगे वामन अर्थात छोटे बनते हैं.भगवान ने कहा, -‘बलि पर मेरी कृपा है, राजा बलि जो यज्ञ कर रहे थे स्वर्ग का आसन पाने के लिए तो मैं इन्हें वह स्थान देता हूं जो देवताओं को भी सुलभ नहीं है.और ये सावर्णि मन्वन्तर में स्वर्ग के राजा बनेंगे.तब तक ये सुतललोक में रहेंगे और मैं सभी प्रकार से इन्हें संरक्षण प्रदान करूंगा.’ बलि की प्रार्थना पर सदैव दर्शन देने का वरदान भी दे दिया— ~~नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिम वस्थितम्.’ अर्थात - 👉🏻हे राजा बलि सुतर लोक में जब जब तुम अपने महलों से बाहर आओगे तब तब मै हाथ में गदा लिए रक्षक के रूप में खड़ा मिलूँगा. इस प्रकार भगवान ने यहां अपनी निग्रहात्मिका कृपा को ही कृपा के रूप में निरुपित किया है.भगवानका कथन है, ‘मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूं, उसके धन का हरण कर लेता हूं, जिस धन के मद से व्यक्ति उन्मत्त होकर लोक की और मेरी अवमानना करता है.इस अवतार द्वारा भगवान ने भक्त के सामने अपने को छोटा मानने का रहस्य भी प्रकट किया है. भगवान ने विराट रूप द्वारा अपनी दिव्यता, प्रभुता, सर्वव्यापकता को दर्शाया है.बलि जैसा आत्मविद् ही भगवान को सर्वस्व अर्पित कर सकता है.राजा बलि नवधा भक्ति में "आत्मनिवेदन भक्ति" के सर्वश्रेष्ठ उपासक है. भगवान का यह अवतार अत्यंत ही सौम्य, शांत तथा निष्काम है.
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्अपने उद्धार के लिये खास बातें
हमारा शरीर निरन्तर जा रहा है, बचपन गया, जवानी चली गयी और हमें पता भी नहीं चला; ऐसे ही एक दिन बुढ़ापा भी चला जायगा। धीरे धीरे मौत हमारे करीब आ रही है। अत: हमें अपना समय उसी काम में लगाना चाहिये, जिसे हम ही कर सकते हैं, दूसरा कोई भी कर नहीं सकता, अपना कल्याण या अपना उद्धार केवल एकमात्र हम ही कर सकते हैं। संसार के काम तो दूसरे लोग भी कर सकते हैं। हम यहाँ निर्धारित समय से ज्यादा रहने वाले नहीं हैं। हम यहाँ आये हैं और हमें एक-न-एक दिन जाना ही पड़ेगा। हम यहाँ पशु-पक्षियों की तरह अपने कर्मों का फल भोगने के लिये ही नहीं हैं, हम यहाँ अपना उद्धार करने के लिये भी आये हैं। इसलिये सबसे पहले यह विश्वास होना चाहिये कि भगवान् मेरे हैं। जैसे माँ मेरी है, यह विश्वास होता है, वैसे ही भगवान् हमारी सबसे बड़ी माँ हैं। वे माँ भी हैं-पिता भी हैं-ऐसा मानना चाहिये। परमात्मा कैसे भी हों, आखिर हैं तो हमारे ही, संसार कैसा भी हो, उसको एक-न-एक दिन छोड़ना ही है। जब उसे छूट जाना है तो उस पर क्या विचार करें, जिसको पाना है उस पर विचार करें। परमपिता परमात्मा हैं और वे अपने ही हैं, उनको छोड़कर शरीर को मुख्य मानना महान् गलती होगी। श्रीभगवान् के अंश को श्रीभगवान् में ही स्थित होना चाहिये, पर हम भूलवश प्रकृति के अंश को पकड़े बैठे हैं-यही गलती है। श्रीभगवान् गीता में कहते हैं - ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥ (गीता १५ ।७) इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है, परंतु वही जीवात्मा प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है अर्थात् वह उन्हें ही अपना मान लेता है। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि श्रीभगवान् जी हमें निरन्तर अपने पास बुला रहे हैं, इसीलिये हम आप कहीं टिक नहीं पाते, जिसे पकड़ते हैं, वह हमारे हाथ से छूट जाता है। इसीलिये परमपिता परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (गीता १८।६६) शरण में जाने का काम जीव का है और सब पापों से मुक्त करने का काम श्रीभगवानजी का है। अपने उद्धार (कल्याण) के लिये खास बात यही है कि आपको मैं-पन बदलना ही होगा। यदि मैं साधक हूँ तो साधन से विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ ? दूसरे का कर्तव्य देखना अनधिकार प्रयास है। साधन करने का निर्धारित समय नहीं होता, ऐसा नहीं है कि इतने घण्टे कर लिया, अब छुट्टी हो गयी। साधना करना तो जीवन है। इसीलिये श्रीगीताजी में श्रीभगवान् जी ने कहा है कि 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च' अर्थात् तू सब समय में निरन्तर अपने सभी कार्यों को करते हुए मेरा स्मरण कर। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर उपसंहार रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने उद्धार के लिये दो बातें खास करनी हैं-एक तो संसार को भगवान् का स्वरूप मानकर कर्तव्यबुद्धि से उसकी सेवा करनी है और दूसरी बात यह कि श्रीभगवान् जी से ही प्रेम करना है, उन्हें ही अपना मानना है। ये काम हमें किसी भी हालत में नहीं छोड़ने हैं।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आज श्रीराधाष्टमी पर अवश्य करें श्रीराधाकृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ
मुनीन्द्र–वृन्द–वन्दिते त्रिलोक–शोक–हारिणि प्रसन्न-वक्त्र-पंकजे निकुञ्ज-भू-विलासिनि व्रजेन्द्र–भानु–नन्दिनि व्रजेन्द्र–सूनु–संगते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१॥ अशोक–वृक्ष–वल्लरी वितान–मण्डप–स्थिते प्रवालबाल–पल्लव प्रभारुणांघ्रि–कोमले । वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥२॥ अनङ्ग-रण्ग मङ्गल-प्रसङ्ग-भङ्गुर-भ्रुवां सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाणपातनैः । निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥३॥ तडित्–सुवर्ण–चम्पक –प्रदीप्त–गौर–विग्रहे मुख–प्रभा–परास्त–कोटि–शारदेन्दुमण्डले । विचित्र-चित्र सञ्चरच्चकोर-शाव-लोचने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥४॥ मदोन्मदाति–यौवने प्रमोद–मान–मण्डिते प्रियानुराग–रञ्जिते कला–विलास – पण्डिते । अनन्यधन्य–कुञ्जराज्य–कामकेलि–कोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥५॥ अशेष–हावभाव–धीरहीरहार–भूषिते प्रभूतशातकुम्भ–कुम्भकुम्भि–कुम्भसुस्तनि । प्रशस्तमन्द–हास्यचूर्ण पूर्णसौख्य –सागरे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥६॥ मृणाल-वाल-वल्लरी तरङ्ग-रङ्ग-दोर्लते लताग्र–लास्य–लोल–नील–लोचनावलोकने । ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ–मुग्ध–मोहिनाश्रिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥७॥ सुवर्णमलिकाञ्चित –त्रिरेख–कम्बु–कण्ठगे त्रिसूत्र–मङ्गली-गुण–त्रिरत्न-दीप्ति–दीधिते । सलोल–नीलकुन्तल–प्रसून–गुच्छ–गुम्फिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥८॥ नितम्ब–बिम्ब–लम्बमान–पुष्पमेखलागुणे प्रशस्तरत्न-किङ्किणी-कलाप-मध्य मञ्जुले । करीन्द्र–शुण्डदण्डिका–वरोहसौभगोरुके कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥९॥ अनेक–मन्त्रनाद–मञ्जु नूपुरारव–स्खलत् समाज–राजहंस–वंश–निक्वणाति–गौरवे । विलोलहेम–वल्लरी–विडम्बिचारु–चङ्क्रमे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१०॥ अनन्त–कोटि–विष्णुलोक–नम्र–पद्मजार्चिते हिमाद्रिजा–पुलोमजा–विरिञ्चजा-वरप्रदे । अपार–सिद्धि–ऋद्धि–दिग्ध–सत्पदाङ्गुली-नखे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥११॥ मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि त्रिवेद–भारतीश्वरि प्रमाण–शासनेश्वरि । रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद–काननेश्वरि व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥१२॥ इती ममद्भुतं-स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम् । भवेत्तदैव सञ्चित त्रिरूप–कर्म नाशनं लभेत्तदा व्रजेन्द्र–सूनु–मण्डल–प्रवेशनम् ॥१३॥ राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः । एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥१४॥ यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः । राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥१५॥ ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके । राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥१६॥ तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् । ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥१७॥ तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् । येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥१८॥ नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः । अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥१९॥
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्श्रीराधा अष्टमी पर विशेष स्तोत्र ( स्तोत्र निधिवन भाग द्वितीय)
श्रीब्रह्मवैवर्त के श्रीकृष्णजन्म खण्ड ९२ । ६३-९३ में वर्णित इस उद्धवकृत श्रीराधास्तोत्रम् को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पाठ करता है; उसे बन्धु-वियोग, भयंकर रोग, शोक, स्त्री को पतिवियोग और पति को अपनी पत्नी वियोग नहीं होता है । इसके अतिरिक्त पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, भूमिहीन को भूमि, प्रजाहीन को प्रजा, रोगी से रोग विमुक्त, बँधा हुआ बन्धन से मुक्त, भयभीत भय से मुक्त, आपत्तिग्रस्त संकट से छुटकारा पा जाता है और मूर्ख पण्डित होकर इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वैकुण्ठ में जाता है । अथ उद्धवकृतं श्रीराधा स्तोत्रम् मूलपाठ ॥ उद्धव उवाच ॥ वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुरवन्दितम् । यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम् ॥ १ ॥ नमो गोकुलवासिन्यै राधिकायै नमो नमः । शतशृङ्गनिवासिन्यै चन्द्रावत्यै नमो नमः ॥ २ ॥ तुलसीवनवासिन्यै वृन्दारण्यै नमो नमः । रासमण्डलवासिन्यै रासेश्वर्यै नमो नमः ॥ ३ ॥ विरजातीरवासिन्यै वृन्दायै च नमो नमः । वृन्दावनविलासिन्यै कृष्णायै नमो नमः ॥ ४ ॥ नमः कृष्णप्रियायै च शान्तायै च नमो नमः । कृष्णवक्षःस्थितायै च तत्प्रियायै नमो नमः ॥ ५ ॥ नमो वैकुण्ठवासिन्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः । विद्याधिष्ठातृदेव्यै च सरस्वत्यै नमो नमः ॥ ६ ॥ सर्वैश्वर्याधिदेव्यै च कमलायै नमो नमः । पद्मनाभप्रियायै च पद्मायै च नमो नमः ॥ ७ ॥ महाविष्णोश्च मात्रे च पराद्यायै नमो नमः । नमः सिन्धुसुतायै च मर्त्यलक्ष्म्यै नमो नमः ॥ ८ ॥ नारायणप्रियायै च नारायण्यै नमो नमः । नमोऽस्तु विष्णुमायायै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ ९ ॥ महामायास्वरूपायै सम्पदायै नमो नमः । नमः कल्याणरूपिण्यै शुभायै च नमो नमः ॥ १० ॥ मात्रे चतुर्णां वेदानां सावित्र्यै च नमो नमः । नमो दुर्गविनाशिन्यै दुर्गादेव्यै नमो नमः ॥ ११ ॥ तेजःसु सर्वदेवानां पुरा कृतयुगे मुदा । अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यै च नमो नमः ॥ १२ ॥ नमस्त्रिपुरहारिण्यै त्रिपुरायै नमो नमः । सुन्दरीषु च रम्यायै निर्गुणायै नमो नमः ॥ १३ ॥ नमो निद्रास्वरूपायै निर्गुणायै नमो नमः । नमो दक्षसुतायै च सत्यै नमो नमः ॥ १४ ॥ नमः शैलसुतायै च पार्वत्यै च नमो नमः । नमो नमस्तपस्विन्यै ह्युमायै च नमो नमः ॥ १५ ॥ निराहारस्वरूपायै ह्यपर्णायै नमो नमः । गौरीलोकविलासिन्यै नमो गौर्यै नमो नमः ॥ १६ ॥ नमः कैलासवासिन्यै माहेश्वर्यै नमो नमः । निद्रायै च दयायै च श्रद्धायै च नमो नमः ॥ १७ ॥ नमो धृत्यै क्षमायै च लज्जायै च नमो नमः । तृष्णायै क्षुत्स्वरूपायै स्थितिकर्त्र्यै नमो नमः ॥ १८ ॥ नमः संहाररूपिण्यै महामार्यै नमो नमः । भयायै चाभयायै च मुक्तिदायै नमो नमः ॥ १९ ॥ नमः स्वधायै स्वाहायै शान्त्यै कान्त्यै नमो नमः । नमस्तुष्ट्यै च पुष्ट्यै च दयायै च नमो नमः ॥ २० ॥ नमो निद्रास्वरूपायै श्रद्धायै च नमो नमः । क्षुत्पिपासास्वरूपायै लज्जायै च नमो नमः ॥ २१ ॥ नमो धृत्यै क्षमायै च चेतनायै च नमो नमः । सर्वशक्तिस्वरूपिण्यै सर्वमात्रे नमो नमः ॥ २२ ॥ अग्नौ दाहस्वरूपायै भद्रायै च नमो नमः । शोभायै पूर्णचन्द्रे च शरत्पद्मे नमो नमः ॥ २३ ॥ नास्ति भेदो यथा देवि दुग्धधावल्ययोः सदा । यथैव गन्धभूम्योश्च यथैव जलशैत्ययोः ॥ २४ ॥ यथैव शब्दनभसोर्ज्योतिःसूर्यकयोर्तथा । लोके वेदे पुराणे च राधामाधावयोस्तथा ॥ २५ ॥ चेतनं कुरु कल्याणि देहि मामुत्तरं सति । इत्युक्त्वा चोद्धवस्तत्र प्रणनाम पुनः पुनः ॥ २६ ॥ इत्युद्धवकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्ति पूर्वकम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते हरिमन्दिरम् ॥ २७ ॥ न भवेद् बन्धुविच्छेदो रोगः शोकः सुदारुणः । प्रोषिता स्त्री लभेत् कान्तं भार्याभेदी लभेत् प्रियाम् ॥ २८ ॥ अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो लभते धनम् । निर्भुमिर्लभते भूमिं प्रजाहिनो लभेत् प्रजाम् ॥ २९ ॥ रोगाद् विमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत् बन्धनात् । भयान्मुच्येत् भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ ३० ॥ अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ॥ ३१ प्रत्येक श्लोक का अर्थ सहित पाठ- उद्धव उवाच ॥ वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुरवन्दितम् । यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम् ॥ १ ॥ उद्धव ने कहा — मैं श्रीराधा के उन चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जो ब्रह्मा आदि देवता द्वारा वन्दित है तथा जिनकी कीर्ति के कीर्तन से ही तीनों भुवन पवित्र हो जाते हैं । नमो गोकुलवासिन्यै राधिकायै नमो नमः । शतशृङ्गनिवासिन्यै चन्द्रावत्यै नमो नमः ॥ २ ॥ गोकुल में वास करनेवाली राधिका को बारंबार नमस्कार । शतशृङ्ग पर निवास करनेवाली चन्द्रवती को नमस्कार-नमस्कार है। तुलसीवनवासिन्यै वृन्दारण्यै नमो नमः । रासमण्डलवासिन्यै रासेश्वर्यै नमो नमः ॥ ३ ॥ तुलसीवन तथा वृन्दावन में बसनेवाली को नमस्कार-नमस्कार । रासमण्डलवासिनी रासेश्वरी को नमस्कार-नमस्कार है । विरजातीरवासिन्यै वृन्दायै च नमो नमः । वृन्दावनविलासिन्यै कृष्णायै नमो नमः ॥ ४ ॥ विरजा के तट पर वास करनेवाली वृन्दा को नमस्कार-नमस्कार । वृन्दावन-विलासिनी कृष्णा को नमस्कार-नमस्कार है । नमः कृष्णप्रियायै च शान्तायै च नमो नमः । कृष्णवक्षःस्थितायै च तत्प्रियायै नमो नमः ॥ ५ ॥ कृष्णप्रिया को नमस्कार । शान्ता को पुनः-पुनः नमस्कार । कृष्ण के वक्षः-स्थल पर स्थित रहनेवाली कृष्णप्रिया को नमस्कार-नमस्कार है । नमो वैकुण्ठवासिन्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः । विद्याधिष्ठातृदेव्यै च सरस्वत्यै नमो नमः ॥ ६ ॥ वैकुण्ठवासिनी को नमस्कार । महालक्ष्मी को पुनः पुनः नमस्कार । विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को नमस्कार-नमस्कार है । सर्वैश्वर्याधिदेव्यै च कमलायै नमो नमः । पद्मनाभप्रियायै च पद्मायै च नमो नमः ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण ऐश्वर्यों की अधिदेवी कमला को नमस्कार-नमस्कार । पद्मनाभ की प्रियतमा पद्मा को बारंबार प्रणाम है । महाविष्णोश्च मात्रे च पराद्यायै नमो नमः । नमः सिन्धुसुतायै च मर्त्यलक्ष्म्यै नमो नमः ॥ ८ ॥ जो महाविष्णु की माता और पराद्या हैं; उन्हें पुनः-पुनः नमस्कार । सिन्धुसुता को नमस्कार । मर्त्यलक्ष्मी को नमस्कार-नमस्कार । नारायणप्रियायै च नारायण्यै नमो नमः । नमोऽस्तु विष्णुमायायै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ ९ ॥ नारायण की प्रिया नारायणी को बारंबार नमस्कार । विष्णुमाया को मेरा नमस्कार प्राप्त हो । वैष्णवी को नमस्कार-नमस्कार । महामायास्वरूपायै सम्पदायै नमो नमः । नमः कल्याणरूपिण्यै शुभायै च नमो नमः ॥ १० ॥ महामायास्वरूपा सम्पदा को पुनः-पुनः नमस्कार । कल्याणरूपिणी को नमस्कार । शुभा को बारंबार नमस्कार । मात्रे चतुर्णां वेदानां सावित्र्यै च नमो नमः । नमो दुर्गविनाशिन्यै दुर्गादेव्यै नमो नमः ॥ ११ ॥ चारों वेदों की माता और सावित्री को पुनः-पुनः नमस्कार । दुर्गविनाशिनी दुर्गादेवी को बारंबार नमस्कार । तेजःसु सर्वदेवानां पुरा कृतयुगे मुदा । अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यै च नमो नमः ॥ १२ ॥ पहले सत्ययुग में जो सम्पूर्ण देवताओं के तेजों में अधिष्ठित थीं; उन देवी को तथा प्रकृति को नमस्कार-नमस्कार । नमस्त्रिपुरहारिण्यै त्रिपुरायै नमो नमः । सुन्दरीषु च रम्यायै निर्गुणायै नमो नमः ॥ १३ ॥
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्क्या आप मकान में प्रवेश के बाद से पीड़ित हो रहे हो❓
हर इंसान के जीवन की एक इच्छा होती हैं कि खुद का एक मकान हो, जिसमे सुख के सभी साधन उपलब्ध हो। लेकिन होता उल्टा है । नए मकान में प्रवेश के साथ ही उस पर व परिवार पर समस्या आनी शुरू हो जाती हैं। जो स्वास्थ्य खराब होने से लेकर व्यवसाय में हानि तक होती हैं। क्या कारण है कि घर में समस्या पीछा नहीं छोड़ रही? घर में दोष उतपन्न होने के बहुत से कारण है जिनको इंसान अनदेखा कर देता है। सबसे पहली समस्या है कि जब आप भूमि चयन करते हैं तो ये नहीं जानते कि भूमि आपके लायक है या नहीं। दरअसल हर भूमि के नीचे किसी न किसी की आत्मा रहती हैं जो अच्छी बुरी दोनों हो सकती हैं। अब आप पहले समझिए पृथ्वी की संरचना करोड़ों वर्ष पूर्व हुई उस पर महाभारत से लेकर अब तक कितने युद्ध हुए कितने लोग मरे, कितने दफन हुए किस जगह हुए। इसके बारे में कोई नहीं जानता। अब किस जगह कौन मरा, जो मरा उसे कहां दबाया या दफन किया। वो अच्छी या बुरी आत्मा थी।क्या आप जानते हो की जिस जगह आपका मकान बना हो उस जगह किसी बुरी आत्मा का पूर्व से वास हो। अब आप समझते हो की मैने वास्तु पूजा करवा ली थी। जी नहीं आपने वास्तु पूजा भी जो करवाई थी वो विधिवत नहीं कराई। किसी साधारण ब्राह्मण से बस पूजन करवा लिया। लेकिन आपने जो आत्मा उस जमीन में विराजित है उसे हटाने हेतु क्या किया❓सोचिए❓ अब आगे एक दूसरी समस्या 🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥 आज के समय में एक प्रचलन चल रहा है भगवान की तस्वीर वाली टाइल घर के बाहर लगा लेते है जिससे घर में भारी दोष उतपन्न हो जाता है क्योकि आपने अनजाने में ही सही लेकिन जिस देव या देवी की छवि घर के बाहर लगाई है उनको द्वारपाल की तरह प्रयोग में ला दिया है जिससे उनका अपमान हुआ है। कई लोग हनुमान जी ,देवी जी आदि की टाइल्स घर के बाहर लगा देते। मैने तो कई घर के ये अनुभव भी पाए की घर के बाहर माता लक्ष्मी जी की फोटो या टाइल्स लगा देते। अब आप हो सोचो कि जब घर के बाहर ही भगवान को कर दिया तो क्या होगा ❓ घर के बाहर द्वारपाल को खड़ा किया जाता है किसी देव या देवी को नही। इसलिए ऐसा नही करना चाहिए नही तो गलत परिणाम शीघ्र ही प्राप्त हो जाते है। आइए देखते हैं तीसरा कारण 💥💥💥💥💥💥 अक्सर लोग घर के रसोई घर में जानवरो की बलि देकर पका कर खा जाते हैं। किसी जीव की हत्या का परिणाम क्या होता ये आपको में अलग से समझाऊंगा। जिसके घर में तामसिक भोजन पकाया जाता है वहां पर नकारात्मक शक्ति प्रवेश कर जाती है जिससे घर में अशांति का माहौल बन जाता है अकारण क्रोध आने लगता है। पूजन पाठ में मन नही लगता और करना भी चाहे तो सही प्रकार से नही हो पाता है। दरअसल जब किसी भी जानवर आदि की बलि आप घर में देते हो तो उसकी आत्मा उसी घर में भटकती रहती हैं और एक समय बाद बदला लेती हैं। अगला कारण भी जान लो ☀️🔆☀️🔆☀️🔆☀️ अक्सर आप किसी ज्योतिष को परेशान होने पर पत्रिका दिखाते हो तो वो बताता है कि आपकी पत्रिका में पितृ दोष है। जिस घर में माता पिता का अपमान होता हो उस घर के पितृदेव क्रोधित हो जाते है जिससे परिवार पर पितृ दोष लग जाता है जिसके कारण सब नष्ट हो जाता है। ऐसे में कितने पितृ शांति के लिए पूजन करवा ले कोई लाभ नही होता। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आप कितने ही बड़े ज्योतिष से मिलकर ,हवन कर आदि से भी पितृ की शांति करवा लेे लेकिन कुछ नहीं होगा। कभी किसी पोस्ट में समझाऊंगा की पितृ दोष क्या होता हैं और उसके क्या बुरे परिणाम होते हैं। क्या आप जानते हो की जिस घर में स्त्री अपमानित होती उस घर में दरिद्रता आ जाती हैं। ❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️ आइए अब एक और मूल कारण के बारे में समझाता ह। जिस घर में धर्म परायण स्त्री का अपमान होता है उस घर पर कभी देवी की कृपा नही होती। कितने ही नवरात्रि पूजन आदि कर लो कोई लाभ नही होगा। घर की स्त्री को जो आप गाली बकते या किसी के सामने अपमान करते धीरे धीरे उस घर से बरकत चली जाती हैं। कुलदेव कुलदेवी को घर मै स्थान नहीं देना 🎡🎡🎡🎡🎡🎡 दरअसल अधिकतर घरो में कुलदेव, कुलदेवी के बारे में नई पीढ़ी के लोग जानते ही नहीं । इसका मूल कारण की पुरानी पीढ़ी ने सही मार्गदर्शन नहीं दिया की कुलदेव, कुलदेवी की क्या महत्ता होती हैं और उनकी पूजा कैसे की जाती। घर के किसी भी त्योहार में सबसे पहले कुलदेव, देवी की पूजा की जाती फिर कार्य आरम्भ किया जाता हैं। यदि कुलदेव या देवी नाराज हो जाए तो उस घर में समस्या आती रहती हैं। वैसे तो इस दोष का निवारण मुश्किल होता हैं।क्योंकि समस्या भी आपकी बोई हुई हैं।लेकिन घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाये रखने के लिए कम से कम माह में एक बार हवन आदि अवश्य करना चाहिए।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्कैसे पहचाने आपके ग्रह खराब है?
आइये राहु के बारे मै कुछ नकारात्मक बाते जाने । ये हम सब जानते है की गुरु राहु चांडाल दोष, सूर्य राहु पितृ दोष, ग्रहण दोष, चन्द्र राहु ग्रहण दोष, शनि राहु शापित दोष, मंगल राहु अंगारक दोष बनाते है। मतलब 100 लीटर दूध मै एक बून्द निम्बू की दूध फाड़ देती है । इसी तरह राहु का साथ शुभ ग्रह को खराब कर देता है । इस ग्रह का हर किसी की जिंदगी पर अलग अलग प्रभाव पढ़ता है । जिंदगी मे इसका अधिक प्रभाव पूर्ण नास्तिक से लेकर पागलपन तक बना देता है । ये निर्भर करता है की राहू आपकी जिंदगी मै कितने अंश का है, और प्रभावी ग्रह, स्थान कितना कमजोर है । जब कुंडली मे शनि नीच राशि, कमजोर या दुष्प्रभाव मै हो तब राहू और खराब असर देने लगता है। अब समझते है राहु का सकारात्मक प्रभाव । कभी आपने सूना की किसी को अचानक लाटरी निकल गयी, या मकान खोदने पर गढ़ा हुआ धन निकला, या राजनीति मे अचानक ऊँचे पद पर पहुंच गया,या सट्टा बाजार मै करोड़ो कमाए। ये सब राहू जी के ही कार्य है । अब फिर से समझे की ये तय हो गया की राहु राक्षस है, फिर अमृत को चख कर वो बलशाली हो गया। किन्तु उसकी आदत नकारात्मक ही होती है। लेकिन एक नकारात्मक व्यक्ति भी किसी न किसी पर मेहरबान तो होता ही है, एक गुंडा, बदमाश भी किसी को चाहता तो होगा । वैसे ही राहु सबका बुरा करता है , लेकिन जब अपने उच्च घर मिथुन पुरातन काल अनुसार कहना है वृषभ मै भी जब विराजमान होते है, कन्या राशि मे होते है, तब बहुत ही सकारात्मक प्रभाव देते है, फर्श से अर्श तक, याने जमीन से आसमान तक पहुचाने का कार्य भी इनका ही है । जब शनि शुभ हो,और राहु भी शुभ हो तो समय बदलते देर नही लगती । जो इंसान के पास चाय पीने को रूपये नही रहते वो राहु के समय परिवर्तन के साथ करोड़ो की सम्पत्ति का मालिक बन जाता है । मतलब एक ग्रह गोबर को सोना भी बना सकता है, और सोने को गोबर भी बना देता है । सही मायनो मै राहू को समझ पाना बहुत ही कठिन होता है, क्योकि उसमे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों के गुण है, एक तरफ राक्षस प्रवर्ति , दूसरी और अमृत का अंश चखकर देव गुण । यदि एक सर्प के काटने से हमारी मौत हो सकती है, तो दूसरी और सर्प का जहर हमारी जिंदगी भी बचा सकता है । हर ज्योतिष राहु के नाम पर अक्सर नकारात्मक भ्रामक विचार रखते है, लेकिन हर भाव मे जब यह ग्रह सकारात्मक प्रभाव देता है, तो इंसान को बलशाली से लेकर प्रभावशाली व्यक्ति तक बना देता है। क्या आप जानते हो की कलाकारों की एक्टिंग मै भी राहु और शुक्र की विशेष कृपा जरूरी होती है। हम इस रहस्यमयी ग्रह के बारे मै आगे और चर्चा करते रहेंगे । विशेष उपाय ☸☸☸☸☸☸☸ यदि आपको लगता है की राहु आपके जीवन को , पारिवारिक जिंदगी को,या मस्तिष्क को बैचेन, कर रहा, कार्य मे मन नही लग रहां, रात मे नींद नही आ रही । तो आज आसपास के श्री भैरव भगवान के मन्दिर या क्षत्रपाल जी के मन्दिर जाकर 4 बत्ती का सरसो का तेल का दीपक जलावें और कुत्तो को ब्रेड, रोटी या इमरती का भोग अवश्य लगावे । सफलता अवश्य मिलेगी।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्!!ऋषिपंचमी व्रतकथा पूजन महत्व एवं उद्यापन विधि!!
✍🏻 गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद् !!ऋषिपंचमी व्रतकथा पूजन महत्व एवं उद्यापन विधि!! ऋषिपंचमी का त्यौहार हिन्दू पंचांग के भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाया जाता है। यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन होता है।भादों शुक्ल पंचमी के व्रत को ऋषि पंचमी व्रत कहते हैं .इसको स्त्री -पुरुष सभी पापों की निवृत्ति के लिए करते हैं .नियम पूर्वक व्रत तथा पूजन करने से सर्वमुख ,आरोग्यता ,समृद्धि ,यश ,धन - धान्य ,संतान ,बैभव तथा विजय की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष मिलता है। ऋषिपंचमी व्रत का विधान - व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहरत में उठकर किसी नदी या जलाशय में स्नान करें। जब स्नान करके पवित्र हो जाएँ तो रेशमी वस्त्र धारण करें .मन में व्रत का निश्चय करके आँगन में बेदी बनाकर शुद्ध मन से पंचामृत तैयार करें। तब अरुंधती सहित सप्त ऋषियों को उस पंचामृत में स्नान करावें । फिर शुद्ध वस्त्र से उनको सुखाकर उनके आसन पर विराजमान करें । तब सप्तऋषियों के निमित्त चन्दन ,अगर ,कपूर आदि गंध देवे ,फूल चढ़ाएं और उनके सम्मुख दीपक जलाकर हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करे कि आप मुझ पर कृपा करें और मेरे द्वारा निवेदित इस पूजा को स्वीकार करें .भगवान् को भोग लगाकर प्रसाद समस्त बन्धु बांधव कथा सुन्ने वाले में बाँटें। ऋषिपंचमी व्रत की कथा ????? एक समय राजा धर्म का अर्थ जानने की इच्छा से ब्रह्मा जी के समीप गए और उनके चरणों में शीश नवा कर बोले - हे आदिदेव ! आप समस्त धर्मों के प्रवर्तक और गूढ़ धर्मों के जानने वाले हो .आपके मुख से धर्म चर्चा श्रवण कर मन को महान शांति मिलती है .भगवान् के चरण कमलों में प्रीति बढ़ती है ,वैसे तो आपने मुझे नाना प्रकार के व्रतों के विषय पर उपदेश दिए हैं . राजा सुताश्व ने कहा कि हे पितामह! मुझे ऐसा व्रत बताइये जिससे समस्त पापों का नाश हो जाये। तब ब्रह्माजी ने कहा-राजन मैं तुम्हें वह व्रत बताता हूँ जिससे समस्त पाप विनाश को प्राप्त होंगे, यह ऋषिपंचमी का व्रत है जिसके करने से नारी जाति के तमाम पाप दूर होकर पुण्य की भागी होती है। इसके लिए तुमसे एक पुरातन कथा कहता हूँ कि विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक सदाचारी ब्राह्मण निवास करते थे। उनकी पतिव्रता नारी सुशीला से एक पुत्री और एक पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया गया, पर विधि के विधान से वह कन्या विधवा हो गई, तो वह अपने सतीत्व की रक्षा पिता के घर रह करके करने लगी। एक दिवस कन्या माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी तो, रात भर में उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गए, सुबह जब कुछ शिष्यों ने उस कन्या को अचानक इस दशा में देख उसकी माता सुशीला को निवदेन किया कि माता गुरू पुत्री के दुःख को देखिये। गुरु पत्नी ने जाकर पुत्री को देखा और उसे अपनी पुत्री की अचानक यह दशा देखके नाना तरह से विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई। ब्राह्मण भी पुत्री की दशा देखकर अति विस्मय को प्राप्त हुए, और दुखी हुए, तब ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहा, महाराज!क्या कारण है कि इस पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए? तब महाराजा ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि इस पुत्री ने जो सात जन्म पहिले ब्राह्मणी थी ऋषि पंचमी व्रत!!!!!! तो एक दिन रजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री छु ली और ऋषिपंचमी व्रत को भी अनादर से देखा, उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए क्योंकि रजस्वला ( रजोधर्म) वाली नारी प्रथम दिन चांडालनी के बराबर व दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान व तीसरे दिन धोबिन के समान शास्त्र दृष्टि से मानी जाती है। तुम्हारी कन्या ने ऋषिपंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये इससे ब्राह्मण कुल में जन्म तो हुआ, पर शरीर में कीड़े पड़ गए हैं ।तब सुशीला ने कहा, महाराज ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे संसार के प्राणीमात्र इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले हे सहधर्मिणी! यह व्रत भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है। पंचमी के दिन पवित्र नदी में स्नान कर व्रत धारण कर सायंकाल सप्तऋषियों का पूजन विधान से करना चाहिए, भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीप के उस पर अष्ट कमल दल बनाकर नीचे लिखे सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए। महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ महर्षियों की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत को करके उद्यापन की विधि भी करनी चाहिए। चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करके पंचमी के दिन व्रत आरम्भ करे, सुबह नदी या जलाशय में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बना कर । उस पर कलश स्थापन करे। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बांधकर पूजासामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल्लू पर सप्तऋषियों की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें फिर घोड़षोपचार से पूजन कर रात्रि को पुराण का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर संतुष्ट करें। इस प्रकार इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यवती होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है। द्वितीय कथा- दूसरी कथा भविष्य पुराण में इस प्रकार आती है कि एक बार महाराज कृष्ण से महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि वह कौन पंचमी है जिसके करने से नारी जाति दोष से मुक्त हो करके महत् पुण्य को प्राप्त होती है आप मुझे संक्षेप में श्रवण कराइए। तब भगवान कृष्णजी ने कहा, राजन! भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की पंचमी को ऋषि का व्रत रहने से नारी रजस्वला से मुक्त होती है क्योंकि जब इन्द्र ने वृत्रासुर को मारा था, तब ब्रह्महत्या का एक भाग नारी के रज में, दूसरा नदी के फेन में, तीसरा भाग पर्वतों, चौथा भाग अग्नि की प्रथम ज्वाला में विभक्त किया था। इससे हर जाति की नारी रजस्वला होने पर प्रथम दिन चाँडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन की तरह दोषी होती है। इससे उस दिन प्रति वस्तु छूने से अपवित्र होकर दोष होता है। इस ऋषिपंचमी व्रत के करने से यह दोष मुक्त होकर नारी पवित्रता को प्राप्त होती हे। हे राजन! विदर्भ देश में एक श्येनजित नाम का राजा था, और उसी राज में एक सुमित्र नाम का विद्वान ब्राह्मण था, उसकी पत्नी का नाम जयश्री था। एक दिन वह रसोई घर में रजस्वला धर्म को प्राप्त हो गई, और वह समयानुसार भोजन आदि वस्तु छूती रही, इस प्रकार समय पाकर दोनों पति पत्नी की मृत्यु हो गई। मरने पर ब्राह्मणी का कुतिया का जन्म हुआ, और ब्राह्मण को बैल का जन्म लेना पड़ा। पर दोनों को अपने तप के प्रभाव से पूर्व जन्म की बातों का स्मरण बना रहा और यह दोनों प्राणी अपने ही पुत्र के घर में पुनः | जन्मे। एक दिन पितृ पक्ष में ब्राह्मण कुमार ने अपने पिता की श्राद्ध तिथि में विधि के साथ ब्राह्मण भोज रखा और अपनी पत्नी से स्वादिष्ट पकवान खीर आदि बनवाकर तैयार की। भाग्यवश एक साँप ने उस खीर में जहर उगल दिया। यह हाल वह ब्राह्मणी कुतियां बनी देख रही थी, तो उसने सोचा कि अगर ब्राह्मण खायेंगे तो मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे, इससे मेरे लड़के को हत्याओं का भारी पाप लगेगा इससे उस खीर को कुतिया ने जान बूझ कर जूठी कर दी, उस बहू ने कुतिया को इतनी मार मारी कि उसकी कमर तोड़ दी और खीर फेंक कर दूसरी बना ली, फिर श्राद्ध कर सब ब्राह्मणों को भोजन कराया। रात को कुतिया ने जाकर अपने पूर्व पति बैल से दिन में होने वाली सारी घटना बताई, तो बैल बोला-प्रिये! तुम्हारे पाप के संसर्ग से आज मुझे बैल होना पड़ा, और आज मेरे लड़के ने दिन भर मेरा मुँह बाँधकर जोता है और अभी तक एक मुट्ठी घास भी नहीं डाली, यह सारी बातें वह ब्राह्मण बालक भी सुनता रहा। जिससे वह बड़ा दुःखी हुआ। माता पिता को भोजन देकर वह दुःखित मन से चला गया। उधर ऋषियों को दंडवत करके पूछा, महाराज, मेरे माता पिता कुतिया व बैल की योनि में हैं। वह किस प्रकार इस योनि से छुटकारा पा सकेंगे तो ऋषियों ने बताया तुम्हारे माता पिता ने रजोधर्म दोष से कुतिया व बैल का जन्म पाया है। इससे तुम घर जाकर विधि से उत्तम व्रत ऋषिपंचमी का करके उसका फल अपने माँ बाप को समर्पण करो, जिससे वह पशु योनि से मुक्त होकर स्वर्ग प्राप्त करें।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्गणेश चतुर्थी: इस मुहूर्त में करें गणपति की पूजा
गणेश चतुर्थी हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इसे विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी 31 अगस्त को पड़ रही है। इस दिन भगवान गणेश के भक्त उनकी प्रतिमा घर लाकर उसकी स्थापना करते हैं। इस साल गणेश चतुर्थी पर करीब दस साल बाद एक विशेष संयोग बनने जा रहा है। इस संयोग में जो लोग भगवान गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना करेंगे, उनकी सभी मनोकामानाएं जल्द पूरी होंगी। साथ ही भगवान गणेश की विशेष कृपा भी उन पर होगी। 31 अगस्त को उदिया कालीन चतुर्थी तिथि और मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी होने से इसी दिन विनायक चतुर्थी का व्रत-पूजन सर्वमान्य होगा। इस शुभ संयोग में गणपति की पूजा करना भक्तों के लिए बेहद कल्याणकारी होगा। गणेश की पूजा-पाठ करने से जो भी विघ्न-बाधाएं आ रही हैं, वो दूर होंगी और निश्चित तौर से लाभ होगा। गणेश चतुर्थी पर रवि योग भी रहेगा। गणेश पूजा शुभ मुहूर्त: अमृत योग: सुबह 06 बजकर 09 मिनट से लेकर 09 बजकर 18 मिनट तक शुभ योग: सुबह 11 बजकर 11 से लेकर 12 बजकर 27 मिनट तक तथा अपराह्न 3 बजकर 36 मिनिट से सायाह्न 6.45 बजे पर्यंत पूजा में इन चीजों को करें शामिल: गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को कुछ खास चीजें अर्पित करने से विशेष लाभ मिलता है। ऐसा कहते हैं कि इस दिन हल्दी, नारियल, मोदक, सुपारी, गेंदे का फूल, केला आदि चढ़ाने से गणपति प्रसन्न होते हैं। घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और जीवन में चल रही मुश्किलें खत्म होती हैं। भगवान श्री गणेश जी की पूजा के दौरान उन्हें उनकी प्रिय चीजें अर्पित करते हैं। कुछ चीजों के बिना गणेश जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसे में गणेश जी की पूजा में इन 6 चीजों को जरूर शामिल करें। दुर्वा: भगवान गणेशजी को दूर्वा अति प्रिय है। इस लिए इनकी पूजा के समय 3 या 5 फुनगी वाली दूर्वा जरूर अर्पित करनी चाहिए। इससे गणेश भगवान अति प्रसन्न होते हैं और भक्तों की हर कामना पूरी करते हैं। मोदक: भगवान गणपति को मिठाई में मोदक अति प्रिय है। इस लिए भगवान गणेश की पूजा के दौरान उनका प्रिय भोग मोदक जरूर अर्पित करें। सिंदूर: हिंदू धर्म में गणेश पूजा के समय सिंदूर का तिलक लगाना बेहद शुभ माना जाता है। पूजा करते समय गणेशजी को सिंदूर चढ़ाएं तथा उनके माथे पर तिलक भी लगायें। उसके बाद खुद भी सिंदूर का तिलक लगाएं। ऐसा करने से आपके जीवन में सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। केला: फलों में केला भगवान गणेश को प्रिय है। इस लिए गणेश चतुर्थी में पूजा के दौरान उन्हें जोड़े में केला चढ़ायें। लाल फूल: भगवान गणपति की पूजा में लाल फूल जरूर अर्पित करें। गन्ना: गणेश चतुर्थी की पूजा के समय श्री गणेश जी को गन्ना चढ़ाएं। कहा जाता है कि ऐसा करने से जीवन में भी मिठास आती है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत
हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है। यह व्रत हस्त नक्षत्र में किया जाता है महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं, विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है, हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं, महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है, अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें। हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं। विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं। भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए- ऊं उमायै नम: ऊं पार्वत्यै नम: ऊं जगद्धात्र्यै नम: ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम: ऊं शांतिरूपिण्यै नम: ऊं शिवायै नम: भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए- ऊं हराय नम: ऊं महेश्वराय नम: ऊं शम्भवे नम: ऊं शूलपाणये नम: ऊं पिनाकवृषे नम: ऊं शिवाय नम: ऊं पशुपतये नम: ऊं महादेवाय नम: निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है। हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री ======================= ०१- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है। ०२- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत। ०३- केले का पत्ता। ०४- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते। ०५- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी। ०६- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,। ०७- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं। ०८- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश। ०९- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद। हरतालिका तीज व्रत कथा भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया। तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा। नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे। तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा। तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किं
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्वास्तु शास्त्र : आपकी उन्नति में बाधक बन सकती है पूजा घर से जुड़ी 7 गलतियां
पहली गलती : हममे से कई लोग अपने शयन कक्ष में ही पूजा स्थान को बना लेते हैं, जो वास्तु शास्त्र के अनुसार बिल्कुल भी सही नहीं है। शयन कक्ष में पूजा घर नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पारिवारिक जीवन के संबंधों में काफी परेशानी आती है। दूसरी गलती : देखा जाए तो आजकल घर में मंदिर बनाने का प्रचलन भी काफी बढ़ गया है। जबकि वास्तु विज्ञान के अनुसार घर में पूजा का स्थान अलग से होना चाहिए… लेकिन यह मंदिर नहीं होना चाहिए। मंदिर खुले स्थानों में होना ही वास्तु के अनुसार उचित माना गया है। तीसरी गलती : परिवार के लोग अक्सर छुट्टियां मनाने या फिर किसी अन्य काम से अपने-अपने घर में ताला लगाकर चले जाते हैं और तो और घर के अंदर मौजूद पूजा घर में भगवान को भी कई लोग बंद कर देते हैं। बता दें कि वास्तु विज्ञान के अनुसार मकान में अगर आपने पूजा घर बनाया हुआ है और उनमें देवी-देवताओं को बैठाया है तो आपको यही प्रयास करना चाहिए कि इनकी पूजा नियमित रूप से ज़रूर हो। घर में भले ही आप ताला लगाएं लेकिन पूजा घर में ताला भूलकर भी लगाकर कहीं ना जाएं। चौथी गलती : ध्यान रखें कि आप पूजा घर में निर्माल्य यानी पुराने हो चुके फूल, माला, अगरबत्तियां जमा करके गलती से भी ना रखें, क्योंकि इनसे नकारात्मक उर्जा का संचार होता है, जो आपकी खुशियां और आय को कम करने का काम करता हैं। पांचवीं गलती : यह बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे वास्तुशास्त्र के अनुसार पूजा घर शौचालय और स्नान गृह की दीवारों से लगा हुआ नहीं होना चाहिए। छठी गलती : बहुत से लोग अपने रसोई घर के साथ ही पूजा घर को बना लेते हैं, जो कि गलत है क्योंकि इसका कारण यह है कि रसोई घर में जूठन और डस्टबीन जैसी चीजें पूजा घर की पवित्रता को नष्ट कर देते हैं। सातवीं गलती : अपने घर में सीढ़ी के नीचे भी पूजा घर नहीं बनानी चाहिए। वास्तु शास्त्र से जुड़ी यह बातें आप अवश्य अपनाएंगे और अपने जीवन को सफल बनाएंगे। घर में खुशियों का आगमन होगा तो आपकी खुशियां दोगुनी अपने आप हो जायेगी।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्क्या आपके हर कार्य असफल होते है❓
हम में से कई जातक ऐसे भी होते हैं जो हर रोज घर से किसी कार्य हेतु तो निकलते हैं,लेकिन शाम होने तक उनका कोई कार्य सफल नहीं हो पाता। आखिर उन्हें हर कार्य में निराशा ही मिलती हैं। आइयें, मैं आपकों कुछ कारण और निवारण बताता हूं। जिसके प्रयोग से ईश्वर की कृपा प्राप्त होगी और कार्य में सफलता मिलेगी। जैसे कि किसी भी अच्छे काम के लिए निकलने से पहले लोग भगवान का नाम जरूर लेते हैं। घर के बड़े अक्सर घर से निकलने से पहले दही खाकर निकलने को कहते हैं। किसी शुभ काम के लिए घर से निकलने से पहले दही खाना अच्छा माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि केवल दही ही नहीं बल्कि दिन के अनुसार अलग-अलग चीजे खाने या कुछ चीजें करने से दिन अच्छा रहता है और काम भी पूरा हो जाता है। ऐसे में अगर आप किसी इंटरव्यू या किसी अच्छे काम के लिए घर से बाहर जा रहे हैं, तो इन चीजों को करने से आपका वह काम जरूर पूरा होगा। रवि को पान, सोम को दर्पण। मंगल को गुड़ करिये अर्पण॥ बुधे धनिया बीफ़े जीर। शुक्र कहे मोहि दही की पीर॥ 1. अर्थात रविवार को घर से किसी शुभ काम के लिए निकलने से पहले पान खाना अच्छा माना गया है। 2. उसी प्रकार सोमवार को घर से शीशा देख कर निकलने से अवश्य ही काम पूरा हो जाता है। 3. मंगलवार को घर से गुड़ खाकर निकलना चाहिए। 4. बुधवार को धनिया खाकर घर से निकलना चाहिए। 5. वीरवार को किसी शुभ काम के लिए जीरा खाकर घर से निकलेंगे तो काम जरूर पूरा हो जाएगा। 6. शुक्रवार को दही खाना सबसे अच्छा माना गया है। 7. शनिवार को घर से निकलने से पहले अदरक जरूर खाना चाहिए। इसके साथ ही जब भी हम घर से किसी खास कार्य को लक्ष्य बनाकर निकलते हैं, उस वक्त सीधा पैर पहले बाहर रखने से निश्चित ही आपको कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। यह परंपरा काफी पुरानी है, जिसे हमारे घर के बुजुर्ग समय समय पर बताते हैं। इस प्रथा के पीछे मनोवैज्ञानिक और धार्मिक कारण दोनों ही हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार सीधा पैर पहले बाहर रखना शुभ माना जाता है। सभी धर्मों में दाएं अंग को खास महत्व दिया गया है। सीधे हाथ से किए जाने वाले शुभ कार्य ही देवी देवताओं द्वारा मान्य किए जाते हैं। देवी देवताओं की कृपा के बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। इस परंपरा के पीछे एक तथ्य यह भी है कि इसका हम पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। सीधा पैर पहले बाहर रखने से हमें सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है और मन प्रसन्न रहता है। इस बात का हम पर दिनभर प्रभाव रहता है। बाएं पैर को पहले बाहर निकालने पर हमारे विचार नकारात्मक बनते हैं। हमारा पारम्परिक स्वास्तिक चिन्ह भी दाहिने ही घूमता है। हनुमान जी की आरती में भी है ‘बायें भुजा सब असुर संहारे, दाहिने भुजा सब संत जन उबारे’ अर्थात् अशुभ काम बायें और शुभ काम दाहिने हाथ से किया जाता है। यदि आपका हर कार्य बिगड़ रहा है तो घर से किसी भी शुभ कार्य के लिए निकलते समय पहले 'श्री गणेशाय नम:' बोलें फिर विपरीत दिशा में 4 पग जाएं, इसके बाद कार्य पर चले जाएं, कार्य जरूर बनेगा। घर की दहलीज के बाहर कुछ काली मिर्ची के दाने बिखेर दें और उस पर से पैर रखकर निकल जाएं फिर पीछे पलटकर न देंखे। उक्त उपाय से बिगड़े कार्य बन जाएंगे। इन सभी प्रयोगों के साथ जीवन में मनवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से अपने माता - पिता और बड़े बुजर्गो का आशीर्वाद लें कर ही अपने दिन की शुरुआत करें और तभी घर से कहीं बाहर जाएँ ,याद रखिये उनका कभी भी किसी भी दशा में दिल न दुखाएं । सुबह उठते ही सर्वप्रथम अपने दोनों हाथों की हथेलियों को जोडक़र गौर से देखें , फिर उसे 3 बार चूम कर अपने चेहरे पर फिराएं, उसके बाद अपने इष्टदेव को मन ही मन में प्रणाम करते हुए अपना दाहिना पावं जमीन पर रखें, तत्पश्चात अपने माता-पिता के चरण छू कर उनसे आशीर्वाद लें उनका अभिवादन करें तभी कुछ और बोलें... यह दिन की शुरुआत बहुत ही चमत्कारी मानी जाती है, इससे आप निश्चित ही पूरे दिन उत्साह और प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। प्रतिदिन प्रात: काल कुल्ला करके सर्वप्रथम थोडा शहद चख लें, तत्पश्चात नियमित रूप से सुबह नहाने के बाद सूर्य देवता को ताम्बें के बर्तन में गुड़ / चीनी, फूल मिश्रित जल से अध्र्य दिया करें, इससे जीवन में समस्त बाधाएं दूर होती है एवं मान सम्मान, ऐश्वर्य और सफलता की प्राप्ति होती है। इन उपयोगों को जीवन में रूटीन में लाइए और धीरे धीरे आपको महसूस होगा कि मेरे हर कार्य अब बनना शुरू हो गए है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्शास्त्रों के अनुसार पूजा अर्चना में वर्जित काम
१) गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं २) देवी पर दूर्वा न चढ़ाएं ३) शिव लिंग पर केतकी फूल न चढ़ाएं ४) विष्णु भगवान को तिलक में अक्षत न चढ़ाएं ५) दो शंख एक समान पूजा घर में न रखें ६) मंदिर में तीन गणेश मूर्ति न रखें ७) तुलसी पत्र चबाकर न खाएं ८) द्वार पर जूते चप्पल उल्टे न रखें ९) दर्शन करके बापस लौटते समय घंटा न बजाएं १०) एक हाथ से आरती नहीं लेना चाहिए ११) ब्राह्मण को बिना आसन बिठाना नहीं चाहिए १२) स्त्री द्वारा दंडवत प्रणाम वर्जित है १३) बिना दक्षिणा ज्योतिष का कोई भी प्रश्न नहीं पूछना चाहिए। १४) घर में पूजा घर में अंगूठे से बड़ा शिवलिंग न रखें १५) तुलसी पेड़ में शिवलिंग किसी भी स्थान पर न हो १६) गर्भवती महिला को शिवलिंग स्पर्श नहीं करना है १७) स्त्री द्वारा मंदिर में नारियल नहीं फोडना है १८) रजस्वला स्त्री का मंदिर प्रवेश वर्जित है १९) परिवार में सूतक हो तो पूजा प्रतिमा स्पर्श न करें २०) शिव जी की पूरी परिक्रमा नहीं किया जाता २१) शिव लिंग से बहते जल को लांघना नहीं चाहिए २२) एक हाथ से प्रणाम न करें २३) दूसरे के दीपक में अपना दीपक जलाना नहीं चाहिए २४.१)चरणामृत लेते समय दायें हाथ के नीचे एक नैपकीन रखें ताकि एक बूंद भी नीचे न गिरे २४.२) चरणामृत पीकर हाथों को शिर या शिखा पर न पोछें बल्कि आंखों पर लगायें शिखा पर गायत्री का निवास होता है उसे अपवित्र न करें २५) देवताओं को अगरबत्ती न करें केवल धूप करें २६) स्त्री द्वारा हनुमानजी शनिदेव को स्पर्श वर्जित है २७) कुंवारी कन्याओं से चरणस्पर्श नहीं करवाना चाहिये। २८) मंदिर परिसर में स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग दें २९) मंदिर में भीड़ होने पर लाईन पर लगे हुए भगवन्नामोच्चारण करते रहें एवं अपने क्रम से ही अग्रसर होते रहें ३0) शराबी का भैरव के अलावा अन्य मंदिर प्रवेश वर्जित है ३१) मंदिर में प्रवेश के समय पहले दाहिना पैर और निकास के समय बाया पांव रखना चाहिए ३२)घंटी को इतनी जोर से न बजायें कि उससे कर्कश ध्वनि उत्पन्न हो ३४)हो सके तो मंदिर जाने के लिए एक जोड़ी वस्त्र अलग ही रखें ३५) मंदिर अगर ज्यादा दूर नहीं है तो बिना जूते चप्पल के ही पैदल जाना चाहिए ३६) मंदिर में भगवान के दर्शन खुले नेत्रों से करें और मंदिर से खड़े खड़े वापिस नहीं हों,दो मिनट बैठकर भगवान के रूप माधुर्य का दर्शन लाभ लें ३७) आरती लेने अथवा दीपक का स्पर्श करने के बाद हस्तप्रक्षालन अवश्य करें। ये सभी बताई गई बातें हमारे ऋषि मुनियों से परंपरागत रूप से प्राप्त हुई है।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्जानिए शिवलिंग पर क्या चढ़ाने से क्या फल मिलता है?
शिवलिंग पर दूध अर्पित करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर दही अर्पित करने से हमें जीवन में हर्ष और उल्लास की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर शहद चडाने से रूप और सौंदर्य प्राप्त होता है , वाणी में मिठास रहती है, समाज में लोकप्रियता बढ़ती है। शिवलिंग पर घी चढ़ाने से हमें तेज की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर शकर चढ़ाने से सुख - समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर ईत्र चढ़ाने से धर्म की प्राप्ति होती हैं। शिवलिंग पर सुगंधित तेल चढ़ाने से धन धान्य की वृद्धि होती है, जीवन में सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर चंदन चढ़ाने से समाज में यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर केशर अर्पित करने से दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है , विवाह में आने वाली समस्त अड़चने दूर होती है, मनचाहा जीवन साथी प्राप्त होता है विवाह के योग शीघ्र बनते है । शिवलिंग पर भांग चढ़ाने से हमारे समस्त पाप समस्त बुराइयां दूर होती हैं। शिवलिंग पर आँवला अथवा आँवले का ऱस चढ़ाने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है । शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाने से समस्त पारिवारिक सुखो की प्राप्ति होती है , परिवार के सदस्यों के मध्य में प्रेम बना रहता है। शिवलिंग पर गेहूं चढ़ाने से वंश वृद्धि होती है, योग्य संतान की प्राप्ति होती है, संतान आज्ञाकारी होती है। शिवलिंग पर चावल चढ़ाने से धन और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। शिवलिंग पर तिल चढ़ाने से पापों समस्त रोगो का नाश होता है। शिवलिंग पर जौ अर्पित करने से सांसारिक सुखो की प्राप्ति होती है। भगवान भोलेनाथ की बेलपत्र से पूजा करने से सभी संकट दूर होते है। भगवान भोलेनाथ की दूर्वा से पूजन करने दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। भगवान भोलेनाथ की हारसिंगार के फूलों से पूजन करने पर जीवन में सुख-संपत्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। भगवान भोलेनाथ पर चमेली के फूल चढ़ाने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। भगवान भोलेनाथ की धतूरे से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। भगवान भोलेनाथ की आंकड़े के फूल से पूजन, श्रंगार करने से जीवन के सभी सुख मिलते है, पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान भोलेनाथ की अलसी के फूलों से पूजन करने से मनुष्य सभी देवताओं का प्रिय हो जाता है। भगवान भोलेनाथ की बेला के फूल से पूजन करने पर मनचाहा, सुंदर जीवनसाथी मिलता है। भगवान भोलेनाथ की जूही के फूल से पूजन करने से घर कारोबार में धन धान्य की कोई भी कमी नहीं होती है। पुण्य लाभ के लिये इस लेख को अपने स्वजनों को भी भेजिये।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आपका कौनसा ग्रह खराब है। आइये समझते है ।
जब आपका सूर्य ग्रह खराब हो सूर्य दोष के लक्षण असाध्य रोगों के कारण परेशानी सिरदर्द, बुखार, नेत्र संबंधी कष्ट सरकार के कर विभाग से परेशानी, नौकरी में बाधा आती है, ऐसी स्थिति मे आप सूर्य ग्रह से सम्बन्धी वस्तुओं का दान करे एवं आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। जब चंद्र ग्रह खराब हो तो क्या करें चंद्रमा दोष के लक्षण: जुकाम, पेट की बीमारियों से परेशानी घर में असमय दुधारू पशुओं की मत्यु की आशंका अकारण शत्रुओं का बढ़ना, धन का हानि,फेफड़े के रोग,बिना वजह मानसिक तनाव इनसे बचाव हेतु चन्द्रमा की वस्तुओं का दान करे, शिव आराधना करें,किसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करें। मंगल जब खराब हो ऐसे जाने मंगल दोष के लक्षण: घर में चोरी होने का डर घर-परिवार में लड़ाई-झगड़े की आशंका भाई के साथ संबंधों में अनबन दांपत्य जीवन में तनाव, अकाल मृत्यु की आशंका, जमीन विवाद, श्री बजरँगबली की सेवा करे,मंगल की वस्तुओं का दान करे, मंगलवार व्रत रखें, सात्विक भोजन करें । जब बुध खराब हो कैसे जाने बुध दोष के लक्षण: स्वभाव में चिड़चिड़ापन जुए-सट्टे के कारण धन की बड़ी हानि दांत से जुड़े रोगों के कारण परेशानी सिर दर्द के कारण अधिक तनाव की स्थिति बहन, बुआ, बेटी की स्थिति खराब, त्वचा रोग बढ़ते जायेगे इस स्थिति मे बुध का दान करे,देवी पाठ करे, हरे वृक्षों की सेवा करे, घर मे तुलसीजी की सेवा करें जब गुरु खराब हो कैसे जाने गुरू दोष के लक्षण: सोने की हानि, चोरी की आशंका उच्च शिक्षा की राह में बाधाएं झूठे आरोप के कारण मान-सम्मान में कमी पिता को हानि होने की आशंका कन्या की शादी मैं परेशानी ऐसी स्थिति मैं गुरु का दान करे। बुजुर्गो ,ब्राह्मणों, सन्तो के चरण छूकर आशीर्वाद ले। पीपल या केले की पूजा करें । जब शुक्र खराब हो कैसे जाने शुक्र दोष के लक्षण: बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबंधी रोगों से परेशानी राजनीति के क्षेत्र में हानि, प्रेम व दापंत्य संबंधों में अलगाव जीवनसाथी के स्वास्थ्य को लेकर तनाव। यौन सम्बन्धी समस्याएं। समझ लीजिये शुक्र खराब है। श्री सूक्त का पाठ करे, गाय को ज्वार खिलावें । मन्दिर मैं घी,कपूर, रुई की बत्ती,इतर दान करे। जब शनिदेव खराब हो पता करें शनि दोष के लक्षण: पैतृक संपत्ति की हानि, हमेशा बीमारी से परेशानी मुकदमे के कारण परेशानी बनते हुए काम का बिगड़ जाना घुटनो के नीचे दर्द, समझ लीजिये शनिदेव अप्रसन्न हैं । शनिदेव को शनिवार सांय तेल, उड़द, काली तिल अर्पित करे, विकलांग की सेवा करे, काली गाय को रोटी दे । जब राहु खराब हो पता करे राहु दोष के लक्षण: शराब, नशे की लत लगना, भगवान के प्रति नास्तिक, गैस बनना, मोटापेके कारण परेशानी अचानक दुर्घटना, लड़ाई-झगड़े की आशंका हर तरह के व्यापार में घाटा कुबुद्धि होना सर्प का दिखना समझ जाएं राहू खराब हैं। मां सरस्वती की आराधना करें ऊं ऐं सरस्वत्यै नम मंत्र का 1 माला जाप करें तांबेके बर्तन में गुड़, गेहूं भरकर बहते जल में प्रवाहित करें माता से संबंध मधुर रखें। जब केतु खराब हो पता करें केतु दोष के लक्षण: बुरी संगत के कारण धन का हानि जोड़ों के दर्द से परेशानी संतान का भाग्योदय न होना, स्वास्थ्य के कारण तनाव कुत्ते का काटना क्या करें भगवान गणेश की आराधना करें ऊं गं गणपतये नम मंत्र का 1 माला जाप करें गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें दो रंगे कुत्ते को रोटी दे। गरीब को दोरंगा कम्बल दान करे। अब आप समझ गए होंगे कि आपका कौनसा ग्रह खराब है और किस ग्रह की वस्तुओं का दान करना है । आपके जीवन मे आ रही अधिकतर समस्याओं के कारक आप खुद ही हो । जब आप माता पिता, स्त्री, गुरुजन आदि के प्रति अपशब्द बोलते या उनके साथ दुर्व्यवहार करते हो । ये सभी आपको प्रतिउत्तर मैं कुछ नही कहते पर इनके मन से निकली टीस आपके जीवन मैं जहर का काम करती है । कौन कैसा है ये जरूरी नही हम कैसे है ये सोचो।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्आपका कौनसा ग्रह खराब है। आइये समझते है ।
जब आपका सूर्य ग्रह खराब हो सूर्य दोष के लक्षण असाध्य रोगों के कारण परेशानी सिरदर्द, बुखार, नेत्र संबंधी कष्ट सरकार के कर विभाग से परेशानी, नौकरी में बाधा आती है, ऐसी स्थिति मे आप सूर्य ग्रह से सम्बन्धी वस्तुओं का दान करे एवं आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। जब चंद्र ग्रह खराब हो तो क्या करें चंद्रमा दोष के लक्षण: जुकाम, पेट की बीमारियों से परेशानी घर में असमय दुधारू पशुओं की मत्यु की आशंका अकारण शत्रुओं का बढ़ना, धन का हानि,फेफड़े के रोग,बिना वजह मानसिक तनाव इनसे बचाव हेतु चन्द्रमा की वस्तुओं का दान करे, शिव आराधना करें,किसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करें। मंगल जब खराब हो ऐसे जाने मंगल दोष के लक्षण: घर में चोरी होने का डर घर-परिवार में लड़ाई-झगड़े की आशंका भाई के साथ संबंधों में अनबन दांपत्य जीवन में तनाव, अकाल मृत्यु की आशंका, जमीन विवाद, श्री बजरँगबली की सेवा करे,मंगल की वस्तुओं का दान करे, मंगलवार व्रत रखें, सात्विक भोजन करें । जब बुध खराब हो कैसे जाने बुध दोष के लक्षण: स्वभाव में चिड़चिड़ापन जुए-सट्टे के कारण धन की बड़ी हानि दांत से जुड़े रोगों के कारण परेशानी सिर दर्द के कारण अधिक तनाव की स्थिति बहन, बुआ, बेटी की स्थिति खराब, त्वचा रोग बढ़ते जायेगे इस स्थिति मे बुध का दान करे,देवी पाठ करे, हरे वृक्षों की सेवा करे, घर मे तुलसीजी की सेवा करें जब गुरु खराब हो कैसे जाने गुरू दोष के लक्षण: सोने की हानि, चोरी की आशंका उच्च शिक्षा की राह में बाधाएं झूठे आरोप के कारण मान-सम्मान में कमी पिता को हानि होने की आशंका कन्या की शादी मैं परेशानी ऐसी स्थिति मैं गुरु का दान करे। बुजुर्गो ,ब्राह्मणों, सन्तो के चरण छूकर आशीर्वाद ले। पीपल या केले की पूजा करें । जब शुक्र खराब हो कैसे जाने शुक्र दोष के लक्षण: बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबंधी रोगों से परेशानी राजनीति के क्षेत्र में हानि, प्रेम व दापंत्य संबंधों में अलगाव जीवनसाथी के स्वास्थ्य को लेकर तनाव। यौन सम्बन्धी समस्याएं। समझ लीजिये शुक्र खराब है। श्री सूक्त का पाठ करे, गाय को ज्वार खिलावें । मन्दिर मैं घी,कपूर, रुई की बत्ती,इतर दान करे। जब शनिदेव खराब हो पता करें शनि दोष के लक्षण: पैतृक संपत्ति की हानि, हमेशा बीमारी से परेशानी मुकदमे के कारण परेशानी बनते हुए काम का बिगड़ जाना घुटनो के नीचे दर्द, समझ लीजिये शनिदेव अप्रसन्न हैं । शनिदेव को शनिवार सांय तेल, उड़द, काली तिल अर्पित करे, विकलांग की सेवा करे, काली गाय को रोटी दे । जब राहु खराब हो पता करे राहु दोष के लक्षण: शराब, नशे की लत लगना, भगवान के प्रति नास्तिक, गैस बनना, मोटापेके कारण परेशानी अचानक दुर्घटना, लड़ाई-झगड़े की आशंका हर तरह के व्यापार में घाटा कुबुद्धि होना सर्प का दिखना समझ जाएं राहू खराब हैं। मां सरस्वती की आराधना करें ऊं ऐं सरस्वत्यै नम मंत्र का 1 माला जाप करें तांबेके बर्तन में गुड़, गेहूं भरकर बहते जल में प्रवाहित करें माता से संबंध मधुर रखें। जब केतु खराब हो पता करें केतु दोष के लक्षण: बुरी संगत के कारण धन का हानि जोड़ों के दर्द से परेशानी संतान का भाग्योदय न होना, स्वास्थ्य के कारण तनाव कुत्ते का काटना क्या करें भगवान गणेश की आराधना करें ऊं गं गणपतये नम मंत्र का 1 माला जाप करें गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें दो रंगे कुत्ते को रोटी दे। गरीब को दोरंगा कम्बल दान करे। अब आप समझ गए होंगे कि आपका कौनसा ग्रह खराब है और किस ग्रह की वस्तुओं का दान करना है । आपके जीवन मे आ रही अधिकतर समस्याओं के कारक आप खुद ही हो । जब आप माता पिता, स्त्री, गुरुजन आदि के प्रति अपशब्द बोलते या उनके साथ दुर्व्यवहार करते हो । ये सभी आपको प्रतिउत्तर मैं कुछ नही कहते पर इनके मन से निकली टीस आपके जीवन मैं जहर का काम करती है । कौन कैसा है ये जरूरी नही हम कैसे है ये सोचो।
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By गोल्डमेडलिस्ट वैदिक अमिताचार्य, ज्योतिषविशारद एवं वास्तुविद्अजा एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये । 🌹 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । 🌹 पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए । 🌹 इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते करते वे शोक के समुद्र में डूब गये । 🌹 राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया । 🌹 राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये । 🌹 मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी । 🌹 एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये । 🌹 राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है । 🌹 व्रत खोलने की विधि : द्वादशी को सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । ‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ - यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए।